जीवन की लंबी यात्रा में एक समय ऐसा आता है जब मनुष्य बाहरी संसार के शोर को सुनते-सुनते थक जाता है। शब्दों की भीड़, विचारों का कोलाहल, इच्छाओं की दौड़ और उपलब्धियों की प्रतिस्पर्धा—सब कुछ धीरे-धीरे अर्थहीन-सा प्रतीत होने लगता है। तब मन किसी अज्ञात पुकार की ओर आकर्षित होता है। वह पुकार बाहर से नहीं, भीतर से आती है। उसी पुकार का अनुसरण करते हुए मन मौन की ओर बढ़ता है।
मौन केवल बोलना बंद कर देना नहीं है। मौन वह अवस्था है जहाँ मन की अनावश्यक हलचल शांत होने लगती है। जहाँ प्रतिक्रियाओं का आवेग मंद पड़ जाता है। जहाँ व्यक्ति दूसरों को बदलने की अपेक्षा स्वयं को समझने का प्रयास करता है। मौन का मार्ग बाहर की दुनिया से भागने का नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने का मार्ग है।
संसार में रहते हुए मनुष्य अनेक भूमिकाएँ निभाता है। वह किसी का पुत्र है, किसी की माता है, किसी का मित्र है, किसी का सहकर्मी है। इन संबंधों के बीच वह स्वयं को खोजने का प्रयत्न करता है। किंतु अधिकांश समय उसका ध्यान बाहर की ओर ही लगा रहता है। वह दूसरों की सफलताओं को देखता है, दूसरों के विचारों से प्रभावित होता है और दूसरों की स्वीकृति पाने का प्रयास करता है। इस प्रक्रिया में वह अपने ही अंतःकरण की ध्वनि सुनना भूल जाता है।
किन्तु जब जीवन किसी शांत मोड़ पर पहुँचता है, तब भीतर से प्रश्न उठते हैं—मैं कौन हूँ? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या केवल अर्जन, उपभोग और प्रतिस्पर्धा ही जीवन का सत्य है? इन प्रश्नों के उत्तर केवल पुस्तकों, सभाओं अथवा विवादों से प्राप्त नहीं होते। उनके वास्तविक उत्तर तो मनुष्य को अपने ही मौन और आत्मसंवाद में मिलते हैं।
एकांत में बैठा हुआ मन जब स्वयं से संवाद करता है, तब उसे अनुभव होने लगता है कि जीवन का वास्तविक आनंद बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष में निहित है। बिना किसी कारण के हृदय में उठने वाली प्रसन्नता, बिना किसी उपलब्धि के अनुभव होने वाली तृप्ति और बिना किसी अपेक्षा के बहने वाला प्रेम—यही तो आत्मा की भाषा है। यह भाषा शब्दों से नहीं, अनुभूतियों से समझी जाती है।
धीरे-धीरे व्यक्ति अनुभव करता है कि संसार को त्यागने की आवश्यकता नहीं है; आवश्यकता केवल आसक्ति को त्यागने की है। संबंध बने रहते हैं, किंतु उनमें स्वामित्व का आग्रह कम हो जाता है। लोग मिलते हैं, बातें होती हैं, किंतु मन अनावश्यक उलझनों से मुक्त रहने लगता है। तब जीवन सरल हो जाता है। जैसे कोई नदी पर्वतों के बीच से बहते हुए अंततः सागर की ओर अपना मार्ग खोज लेती है, वैसे ही मन भी अपने मूल स्रोत की ओर लौटने लगता है।
मौन के उस पार एक अद्भुत शांति है। वहाँ न तुलना है, न प्रतिस्पर्धा, न स्वयं को सिद्ध करने की व्याकुलता। वहाँ केवल अस्तित्व का सहज आनंद है। ऐसा प्रतीत होता है मानो समस्त सृष्टि एक ही चेतना के सूत्र में बंधी हुई है और हम उसी विराट संगीत का एक स्वर मात्र हैं।
शायद मनुष्य की सबसे बड़ी यात्रा पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा नहीं, बल्कि स्वयं से स्वयं तक की यात्रा है। यह यात्रा शब्दों से मौन तक, अशांति से संतोष तक और अहं से ऐक्य तक पहुँचाती है। और तब अनुभव होता है कि मौन के उस पार कोई शून्य नहीं, बल्कि वही पूर्णता है जिसकी खोज में मनुष्य युगों से भटकता आया है।
— कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

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