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कब तक....??

रक्त के कण कण से
मन के सुने आंगन से 
अब 
रिश्तों को संभालते संभालते 
थक चुकी हूं...!!

खुद के मन दहन की
रोज मर्रा की 
गतिविधि से थक चुकी हूं...!!

तत्पश्चात
अपने ही मन को झूठा
बहलाने की कठिन सी
आंतरिक वकालत से थक चुकी हूं..!!

मूल्यों व आदर्शो की 
पावन प्रतिमा को
आईने के समान चमकाने की
सरफरोश तमन्ना से थक चुकी हूं...!!

हर पाक व कुर्बान भाव से
हर रिश्ता संभालने की 
नाकामयाब कोशिश से 
थक चुकी हूं..!!

स्व मत,परमत, व ईशमत 
की पावन बेला में
सबको पाक करने के
पवित्र प्रयास से थक चुकी हूं...!!

ज्ञान,वास्तव,स्वार्थ,व्यवहार
ईश्वरीय आज्ञा में सरोबार
के बीच संघर्ष की 
नित्य लड़ाई से थक चुकी हूं...!!

है परमात्मन तू है 
इस अटूट विश्वास के सहारे 
जीते जीते
तेरे ही इंतजार में अब थक चुकी हूं..!!

उस आखरी पल के इंतजार में ही रुकी हु...!!
बस अविरत रुकी हु...!!

- वृषाली सानप काले

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