साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं है, वह मनुष्य की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है। प्रत्येक रचना का जन्म किसी न किसी भाव, विचार, अनुभव अथवा प्रश्न से होता है। कई बार कोई घटना हमें भीतर तक स्पर्श करती है और वह कविता बन जाती है। कभी कोई सुखद क्षण मन को इतना आनंदित कर देता है कि शब्द स्वयं पंक्तियों में ढलने लगते हैं।
मेरे अनुभव में रचनाएँ बनाई नहीं जातीं, वे अंकुरित होती हैं। जैसे बीज मिट्टी के भीतर उचित समय की प्रतीक्षा करता है, वैसे ही विचार भी मन में अपना समय आने तक रहते हैं। कभी किसी शब्द के रूप में, कभी किसी शीर्षक के रूप में, तो कभी किसी अधूरी पंक्ति के रूप में वे हमारे भीतर जन्म लेते हैं। यदि उन्हें समय रहते लिख लिया जाए, तो वही आगे चलकर कविता, कहानी या निबंध का रूप धारण कर लेते हैं।
बचपन में माता-पिता और नानी-दादी से सुनी गई कहानियाँ भी हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं। उन कहानियों में केवल मनोरंजन नहीं होता, बल्कि जीवन के मूल्य, संघर्ष से जूझने की शक्ति, धैर्य, परिश्रम और आत्मविश्वास की शिक्षा भी छिपी होती है। जब हम उन्हें आगे लिखते हैं, तो केवल कहानी नहीं लिखते, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अनुभवों का प्रकाश पहुँचाते हैं।
लेखन का एक रोचक पक्ष यह भी है कि कभी-कभी रचनाएँ स्वप्नों में भी जन्म लेती हैं। जागने पर शब्द भले भूल जाएँ, पर उनका भाव मन में कहीं सुरक्षित रह जाता है और अवसर मिलने पर किसी नई रचना के रूप में प्रकट हो जाता है।
मेरे विचार से किसी रचना की वास्तविक सफलता उसकी प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि उसके भाव के संप्रेषण में है। जब पाठक वही अनुभूति महसूस कर सके जो लेखक ने अनुभव की थी, तब रचना अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लेती है। शब्द आँखों तक पहुँचते हैं, पर भाव हृदय तक पहुँचते हैं।
अतः लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, आत्मसंवाद भी है। यह मन के भीतर छिपे बीजों को अंकुरित करने की प्रक्रिया है। जो अनुभूतियाँ सच्ची होती हैं, वे किसी न किसी रूप में शब्द बनकर अवश्य प्रकट होती हैं और तब साहित्य जन्म लेता है।
हैं—
“मन में अंकुरित प्रत्येक विचार रचना नहीं बनता, पर जो विचार बार-बार लौटकर आता है, वह अंततः शब्दों का रूप अवश्य ले लेता है।”
— कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

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