पल के जुगनू


तेरी मेरी बिखरी बातों के,
यादों के समंदर से
कुछ मोती छांटकर मैंने,
पिरोए एक माला में
जो बनकर कविता
निकली मेरे हृदय से..
मत कह कि,
तेरे बिना मैं नहीं...
मैं तो तेरे अंदर ही समाई हूं
महसूस कर मेरी मौजूदगी को
तेरे दिल के हाल से..
वाकिफ़ हूं मैं..
मुझसे छिपा नहीं कुछ
तेरा दर्द ए ज़ख्म..
तेरी आवाज़, तेरी नज़रे..
चुगली कर दिया करती है अक्सर..
चाहे ज़ुबां से कुछ भी कह लो
तेरे ही इर्द-गिर्द मेरी ज़िन्दगी
हर हसरत को करुं पूरी...
यही अरमान है मेरा..
तेरे भावनाओं पर,
जान छिड़क कर..
जन्नत को तेरे कदमों में धर दूँ..
आनंदीत हो तेरा मन...
खुशियों की बरखा कर दूं..
सिमट कर पल के जुगनुओं को..
मैंने मन भर लिया... 

+-+-+-+-+-+-+
- कौशल्या वाघेला


Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं

संस्कृत भाषा के शब्द भंडार से सम्बंधित बातें

इम्तिहान