प्यासी ही प्यासी

ये आँख का दरिया
क्या पी लोगे बोलो
बहता है समुन्दर
मुस्कान से घोलो...!!

मेरे आँख का पानी
ना सुने करे मनमानी
क्या कहूँ मैं कहानी
बस जलती रवानी..।।

किसको कह दू दोषी
किसकी मैं बनु रोषी
हर साथ भी आभासी
मैं तो प्यासी ही प्यासी...।।

ज़ख्मों का न मरहम
दर्द का न हमदम
अब निकलेगा दम
मन पे ही गिरा है बम...।।

स्वार्थी महफ़िल में हम
थके झेलकर ग़म 
घाव अपनों के सनम
किससे न्याय मांगे हम...।।
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- वृषाली सानप काले

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