मैं राधा हूँ

मैं राधा हूँ
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जिंदगी के शीशे पर 
सदैव
अनवरत दस्तक देती 
ही जाती है
उसके अश्को की बूंदें...

बरसाती बारिश में 
वक्त की बेड़ियाँ
पहन मन के
भय और पीड़ा की जुगलबंदी में 
घुलकर एक हो जाती है..
उसके लकीरों की बूंदे...!!

वो सब वो ..
सदियों से 
लिखना चाहती है
पर न भाव जुटते, 
न वृत्त अलंकार मात्रा के टुकड़े मिलते.

कालचक्र के बवंडर में
वो तो बस चलती रही।
विरहिनी न होते हुवे भी
विरहिनी कहलाती रही...!!

परमात्मा के आदेश नुसार
कर्मपथ पर बढ़ती रही..
एक युगभर कृष्ण के 
कांधे पे सर रख 
बेदाग दर्द पीड़ा को
भूलती रही..पर न बही 
एक भी बून्द...!!

आसमान की घटाओं से 
वनों की लतिकाओ से
मासूम फूलों की पंखुड़ियों से
शहतूत की कोंपलों से
चंपा-चमेली के पराग से
मधुमालती की सुगन्धों से
प्यार करते बहाती रही
अपने अश्को की बूंदें ...!!

निराकार की कलम से
भावना की कुलबुलाहट में 
कर्मयोगिनी की आवाज में
सात्विकता की सादगी से
बस कहना चाहती है
उसकी अव्यक्त बूंदे...!!
मैं राधा हु...!!मैं राधा हूँ...!!
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- वृषाली सानप काले

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