क्या है आध्यत्म ..?? सृष्टिचक्र का रहस्य (भाग 16

 जीवन कितना सुंदर व मनोहर है... है ना ..?? परन्तु तब जब हम सत्य से परिचित हो। अगर किसी भी बात का सत्य ज्ञान हमे नही मिलता तो उसे भी जीवन रास नही आता...!! ऐसे कई रहस्य हम नही जानते जो हमे जाग्रत व शास्वत जीवन से जोड़ देते है...!! ईश्वर, सृष्टि, जन्म, मृत्यु, कर्म आत्मा, सम्बन्ध, बन्धन ये भी कुछ ऐसे ही शास्वत मूल्य लिए हुवे है, तथापि हम अनभिज्ञ होने के कारण उन्हें समझ ही नही पाते। ऐसे ही अलौकिक सच्चाई लिए हुवे सृष्टिचक्र भी है जिसे कोई भी नही जानता।
कुछ ऐसे ही सत्य व शास्वत विचार बतलाना मुझे जरूरी लग रहा है।

   सृष्टि के निर्माण, विनाश की प्रक्रिया का नियंत्रक वह है जो विश्व निर्माता है। जिसे हम परम् पिता परमात्मा कहते है। जो इस सृष्टि के अनंत आत्माओं का पिता है।इसलिए हमारा बाप है। जो समय, कर्म, न्याय, संस्कार के प्रति अत्यंत सतर्क है। जो किसी के भी गर्भ से नही निकलते व जन्म लेते।

उसकी नियमावली के अनुसार इस सृष्टि के एक संपूर्ण आवर्तन को पूरा होने के लिए 5000 वर्ष का समय लगता है। जिसे एक कल्प कहते है। ऐसे कैक कल्प आज से पहले हो चुके है। जब ऐसे एक कल्प की पूर्णता व नए कल्प की सुरुवात होने से पहले इस सृष्टि पर परमपिता परमात्मा का आगमन होता है। अर्थात 5000 वर्ष पूरे होने के बाद आत्माओ को ज्ञान साक्षात्कार व मार्गदर्शन देने के लिए ही सृष्टि पर परमात्मा का आगमन होता है...!!

   5000 वर्ष के इस सम्पूर्ण कालखण्ड को, समय को साधारणतः 4 युगों में विभाजित किया गया है। एक युग 1250 वर्ष का है। सत्य युग, त्रेता युग, द्वापर युग, व कलियुग ये चारों युग हम जानते है।लेकिन इनका स्वरूप व परिणाम नही।

तो इसमें से जब सत्य युग की सुरुवात होती है तब इस सृष्टि पर जन्म लेनेवाली आत्माएं वही होती है, जिनमे अत्यंत पवित्रता होती है। जो आत्मा की 16 शक्तियों से परिपूर्ण होती है। जैसे कि आत्मा को देह की जरूरत होती है, तो वह देह आत्मा को सृष्टि के पंचतत्व से अर्थात प्रकृति से प्राप्त होती है। तो जाहिर है आत्मा के सदैव सम्पर्क में आनेवाली ये प्रकृति जिसे माया कहते है, वह बार बार आत्मा पर हावी होने का तथा उसपर कब्जा करने का प्रयास करती है। जब आत्मा मजबूत शक्तियुक्त होती है तो सत्य युग मे माया का आत्मा पर अधिक असर नही होता। आत्मा को सत्ययुग में एक देह में 150 साल की आयु मिलती है। तथा इस युग मे आत्मा 8 जन्म लेती है। परन्तु सतयुग के 1250 वर्ष समाप्त होते होते आत्मा अपनी 2 शक्तियों को खो देती है। फिर सुरु होता है त्रेता युग।त्रेता युग मे धीरे धीरे माया जैसे जैसे आत्मा पर हावी होने लगती है तो आत्मा अपनी शक्तियों का गवाने लगती है।

   जिसके परिणाम स्वरूप त्रेता युग की समाप्ति तक आत्मा के पास केवल 8 शक्तियां जीवित रहती है। त्रेता युग मे आत्मा 14 शक्तियों के साथ आती है, परन्तु अन तक केवल 8 शक्तियां बचती है। त्रेता युग मे आत्मा एक शरीर मे 125 वर्ष रहती है। त्रेता युग मे आत्मा को 12 जन्म लेने पड़ते है।

  परिणामता अगले युग मे अर्थात द्वापर युग में आत्मा 8 शक्तियों के साथ आती है व द्वापर युग की समाप्ति तक आत्मा के पास केवल 2 शक्तियां जीवित रहती है।माया आत्मा को पूर्ण रूप से कब्जा कर लेती है। द्वापर युग मे आत्मा को 21 जन्म लेने पड़ते है। आत्मा एक शरीर मे 100 वर्ष तक रहती है।

    अंतिम युग है कलियुग कलियुग अर्थात काला युग। काली शक्तियों का युग अर्थात मनुष्य के समस्त जन्मों के कर्मो के हिसाब का युग। इस युग मे जिन आत्माओं के पास वो 2 शक्तियां जीवित होती है वे या तो उन्हें अधिक बढाते है या फिर माया के प्रकोप में जुड़कर उन्हें भी गवा देते है। हिसाब चुक्तु होने रहने के कारण हर कोई दर्द में रहता है व माया का विकराल रूप होने के कारण समस्त मूल्य नष्ट होते से नजर आते है।कलियुग में एक आत्मा 43 जन्म लेती है।कलियुग में विकर्मो की विकराल स्वरूप के कारण आत्मा के देह में स्थित रहने की आयु निश्चित नही होती।इस युग मे भी आत्मा की मूल्यता  पूर्णता नष्ट नही होते परन्तु उन्हें जताने के लिए खुदा के बन्दे फरिश्तों का निर्माण होना भी जरूरी होता है।

कलियुग के अंत के समय अर्थात 5000 वर्ष सम्पूर्ण होने के बाद सौ वर्षों का वो समय होता है, जिस समय परमपिता परमात्मा इस सृष्टि पर आते है। इस सौ वर्ष के समय को संगम युग कहते है। संगम युग अर्थात एक कल्प समाप्त होकर दूसरे के आगमन के पहले की स्थिति..!! परिवर्तन एवं निर्माण की स्थिति..!! परमात्मा ने सत्ययुग से लगातार आत्माओ की शक्ति के अनुसार सृष्टि पर भेजी आत्माएं इस संगम युग के समय तक सम्पूर्ण विकारी एवं निकृष्ठ हुई होती है। अगर सत्ययुग के बाद त्रेता युग, त्रेता युग के बाद द्वापर युग, व द्वापर युग के बाद कलियुग एवं कलियुग के बाद संगम युग है, तो स्वाभाविक व वास्तविक सत्य अनुसार संगम युग के बाद सत्ययुग भी जाहिर ही है...!! तो जो समस्त आत्माएं अपनी 16 शक्तियां खो चुकी है उन्हें वह सभी शक्तियां इसी समय पाना भी जरूरी है। वह खुद तो उन्हें हासिल नही कर पाती तो आत्माओ को पाक, पावन, निर्मल, पवित्र व शक्तिशाली बनाने के लिए इस संगम युग मे परमपिता परमात्मा किसी भी वृद्ध देह का अर्थात वह वृद्ध शरीर कुछ हद तक तो पवित्र होना आवश्यक है। उस शरीर की सहायता लेकर यह काम करता है। जिस शरीर मे आकर परमात्मा यह कार्य करते है, उस शरीर को ब्रम्हा यह उपाधि अर्थात नाम देते है। यह कार्य परमात्मा उधार शरीर लेकर इसलिए करते है, क्योँकि परमात्मा तो निराकार है।निराकार का अपना देह नही होता।परमात्मा जन्म मृत्यु से परे है।वे अनादि अनंत है। तो इस काम को वाणी, बुद्धि, दृष्टि, हाथ, व इंसानों की संपर्क में रहे बगैर नही किया जा सकता। इस कार्य की पद्धति में परमात्मा आत्माओ को पहले विकारों से मुक्त बनना, ज्ञान धारण करना, याद की यात्रा करना (परमात्मा से योग लगाना) व सेवाभाव की वृत्ति से जो मिला वो दुसरो को दान देना व सिखाना, इस तरह से होता है..!! ज्ञान, योग, सेवा व धारणा यही वो चार स्तंभ है पवित्र दुनिया को रचने के..!!जिन्हें हर परमात्मा के प्रेमी व दूत को स्वीकारने व निभाने ही होते है। काया वाचा मन व बुद्धि की पवित्रता अनिवार्य होती है...!! इस कार्य के लिए परमात्मा अपने सहयोगी खुद चुनता है व अपने परमात्मिक शक्ति की सहायता से उन्हें शक्तिशाली बनाता है ...!!

जब तक आत्माएं अपनी निश्चित शक्तियां हासिल नही करती तबतक यह कार्य होता रहता है। हर आत्मा का अपना अपना निश्चित अभिनय इस सृष्टिरूपी नाटक के रंगमंच पर कायम होता है। इस नाटक के सभी एक्टर (अभिनेता) अपने अपने रोल (पात्र) के अनुसार शक्तियां प्राप्त नही करते तब तक परमात्मा का कार्य चलता रहता है..!! इसतरह एक तरफ निर्माण का कार्य चलता है तो दूसरी तरफ इस पुराने रंगमंच के बदलाव का काम भी चलता है। तात्पर्य सृष्टि के विनाश की विभीषिका भी सतत चलती रहती है। बाढ़,  सुनामी, अकाल, ठंड, गर्मी, विवाद, बमविस्फोट, अपघात, लड़ाई-झगड़े, खूनखराबा ये ही वो मार्ग है, जिनसे विनाश चलता रहता है। धीरे-धीरे सारी विकारी प्रवृत्तियों का नाश होता जाता है। समस्त गन्दगी को विधाता विनाश की लीला में ढकेल देता है व सत्य शास्वत बच जाता है। तत्पश्चात सत्ययुग की सुरुवात होती है...!! यह सब निर्माण केवल परमपिता परमात्मा करता है...!!

  इस पूर्ण सृष्टि चक्र में कर्म की गति करनेवाला एक्टर आत्मा होती है। जैसा आत्मा का कर्म  होता है वैसा उसका प्रारब्ध बनता है। इसलिए हर आत्मा को 84 मनुष्य जन्म भुगतने पड़ते है। सत्ययुग मे 8 जन्म, त्रेतायुग मे 12 जन्म, द्वापरयुग मे 21 जन्म, तथा कलियुग में 43 जन्म लेने पड़ते है। क्योँकि सत्ययुग मे व त्रेतायुग में आत्मा पर माया का असर नही होता तो आत्मा 100 प्रतिशत से लेकर त्रेता के अंत तक 90 प्रतिशत तक पवित्र पूर्ण पाक होती है। इस समय को आधा कल्प कहते है। सतयुग  में 9 लाख 16108 आत्माएं सृष्टि रँगमन्च पर आती है व त्रेता के अन्य तक  संख्या के तौर पर 33 कोटि आत्माएं होती है। इस 1250 व 1250 अर्थात 2500 वर्ष तक आत्माएं पूर्ण पवित्र होती है।माया अर्थात विकारों के वश में नही आती। ये समस्त पवित्र आत्माएं ही हमारे 33 करोड़ देवी देवतायें है। क्योँकि द्वापर युग मे जब आत्माएं आगे बढ़ती जाती है तो माया का साम्राज्य बढ़ता ही जाता है। 8 शक्तियुक्त आत्माएं भी धीरे धीरे अपनी सभी शक्तियां खोने लगती है। जिनके पास ये कुछ शक्तियां जीवित होती है वो आत्माएं ही अन्य लोगो को समझाने का काम करती है, की अरे उससे डरो, सबसे प्रेम करो, नफरत, घृणा आदि भाव नष्ट करो। उनके समान बनो। वे कितने महान थे।उनके पास तो कई शक्तियां थी। फिर कितनी शक्तियां थी ये कैसे बताए ..?? इसलिए द्वापर युग मे ही वो सब हुवा जो हम आज मान्य करते है सत्य समझकर। तो क्या हुवा थ्या ..??शक्तियां दिखाने के लिए फिर सतयुग व त्रेता युग मे हुई आत्माओं में कोई गणपति था, उसकी 8 शक्ति दिखाने के लिए फिर एक बच्चे का चित्र निकाल फिर उसे 8 हाथ दिखाए गए। स्त्री कितनी शक्तिशाली थी दिखाने के लिए फिर कोई दुर्गा, सप्तश्रृंगी नाम की थी तो उसे 12 शक्तियां थी तो 12 हाथ दिखाए गए। किसी भी तरीके से दृश्य रूप में प्रस्तुत किया गया।

फिर क्या था आगे चलकर उनकी मूर्तियां भी बनी। फिर उन मूर्तियों को रखने के लिए घर भी बना। वही मंदिर कहलाया गया ...!!यही से सुरु हुई मूर्तिपूजा ...!! इसके बाद में जिन्हें ये मंजूर नही हुवा उन्होंने अलग तरीके से सत्य को प्रस्तुत किया अपनी आंतरिक स्थित शक्ति के आधार पर।जैसे  अरे उससे जरा डरो। वह सर्व शक्तिमान है।वह निराकार है। प्रेम प्रति मूर्त है।शास्वत,चिरन्तन है। ये ज्ञान जो भी जिस भी भाषा मे बताते गए, आम जनता ने उनके ही नाम से अलग अलग धर्म बना दिये। उनको ही ईश्वर बना दिया। वो तो खुद के पाक बच्चे थे। फरिश्ते थे। उनमें नानक महावीर, बुद्ध, पैगम्बर, ईसा, आदि कई थे। यही से पैदा हुवे अनेक धर्म, जाती, सम्प्रदाय। यही पर आत्मा की सभी शक्तियां खत्म हो जाती है। उसके आगे आता है कलियुग... जिसमे आत्मा अपनी समस्त शक्ति को नष्ट कर देता है। कुछ के पास जो दो शक्तियां जीवित होती है वे ईश्वर के अस्तित्व के प्रति सजग होती है। वे व्यवहार, वर्तन, विचार व संस्कारित कर्म की पद्धति से लोगो को दिशा देते गए, समझाते गए। इनकी तीव्रता समूचे कलियुग पर बनी रहती है। इन्हें ही हम संत के रूप में जानते है। ये कई संत है। भक्ति मार्ग को जन्म देनेवाले व ईश्वर के बन्दे का सच्चा कार्य करनेवाले यही होते है। परन्तु इनके भी नाम से लोगो ने अलग अलग पंथ निर्माण किये तथा उनमें भी श्रेष्ठ कनिष्ठ को लेकर झगड़े सुरु हुवे।

सृष्टि चक्र में भेजी गई ये आत्माएं तभी वापिस ऊपर परमात्मा के घर जा सकती है, जब स्वयं परमात्मा इस सृष्टि विनाश के बाद ले जाएगा। पाप, कर्म, व अनीति के कारण आत्माएं इतनी भ्र्ष्ट हो चुकी होती है कि स्वयं परमात्मा के पास जाने की ताकत, योग्यता उनमें नही होती।

 ये जो कार्य है यह केवल परमात्मा ही करता है। परमात्मा ने किए हुवे वादे के अनुसार जब इस सृष्टि के विनाश का समय आएगा उस हर वक्त मूल्यों की स्थापना करने व पवित्रता का बंधन आत्मा से जोड़ने के लिए हर वक्त 4 युग के बाद मैं अवश्य आवुगा। उसके आने का समय कलियुग के अंत मे होता है। कलियुग केवल 1100 वर्षो का होता है। 100 वर्ष संगम युग का होता है। इस संगम युग मे ही परमात्मा साधारण मनुष्य के देह की सहायता के द्वारा अपने उन फरिश्ता स्वरूप आत्माओं को स्वयं ढूंढकर उनके द्वारा राजयोग सिखला कर अर्थात अपनी समस्त इंद्रियों को वश में कर योग के माध्यम से मनुष्यों को पीड़ा से मुक्त कर उन्हें उनके सात्विक गुणों को जगाकर परमात्मा का परिचय देकर नए सत्य युग मे जन्म लेने योग्य तैयार करवाता है। ये जो समय है यहां पवित्रता यह प्रमुख गुण है।काया, वाचा, व मन से ही मनुष्य अधिक से अधिक 84 जन्म तक पाप कर्म करता जाता है। जिससे वह खुद भी अनभिज्ञ होता है। खुदा मनुष्य को इसी काया, वाचा व मन से पवित्र बनाता है...!! ये पवित्र बनाने की विधि याने मैडिटेशन...!! नारी नारी को, नर नर को नर नारी को, नारी नर को, वृद्ध, बच्चे समस्त प्रेम के धागे में खुदा बांध लेता है व हर आत्मा को राख्ने की गवाही देता है, इस योग के द्वारा..!! क्योँकि ईश्वर कभी भी किसी भी आत्मा को वह कितनी भी पापी हो सजा नही देती, उस आत्मा के कर्म उसको सजा देते है। परमात्मा तो आत्मा को उसके जैसा केवल पवित्र पाक प्रेम युक्त व दयावान बनाना चाहता है।आत्मा को मुक्ति व जीवन मुक्ति भी कोई भी मनुष्य आत्मा नही देती। केवल परमपिता परमात्मा ही आत्मा को मुक्ति व जीवन मुक्ति देता है। इस 5000 वर्ष के कल्प की समाप्ति का यह अंतिम पर्व है।खुदा को इस सृष्टि पर आकर 98वर्ष कबके हो चुके है।तो जाग जाइयेगा। खुद ही आत्म चिंतन से जानिएगा आप खुद उन 33 करोड़ देवताओं में से कौन हो...??

ये योग ही भगवान के प्रेम में हमें बाँधनेवाला एक पवित्र धागा है, सब शरीर के बंधन और भौतिक दुनिया से हमें मुक्त, और सुरक्षा और संरक्षण की भावनाओं के साथ हमें भरता है। हमारी भावनाओं में हर आत्मा के लिए शुद्ध और ऊंचा रखने की, सदा माफी और शुभकामनाओं के साथ हमे सदैव अपनी दुनिया में प्यार और संतोष का माहौल पैदा करने में सक्षम बनाता है। हम में आत्म - परिवर्तन कर प्रेम का सबूत बनाकर हमारे मन के  व्यर्थ विचारों को अपनाने से इनकार करने के योग्य बनाकर हमारे शब्दों और कार्यों को इतना ताकतवर बनाता है कि एक मिसाल बना देता है।

  हम सदैव प्यार के जादू में चमत्कार को पाना चाहते है उसमें खोना चाहते है वो हमें केवल परमात्मा दिखाता है। उसका प्यार हमे स्पर्श करता है हमारी हर खरोंच को दूर कर देता है। एक फूल के रूप में नाजुक और मजबूत से भी मजबूत बनाता है, सभी तूफानों का सामना करने के लिए। प्रेम स्वतंत्रता और शक्ति का प्रतीक बनाता है। गहन पवित्रता और आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित यह पवित्रता का उपहार हमे तन मन व वाणी तथा विचार से पूर्णतया पवित्र बनाने के बंधन में बांधता है..!!

    अर्थात दया, माफी, प्रेम, व पवित्रता की शास्वत शक्तियों को जगाकर आत्मा आत्मा में भाईचारे को कायम करना ही तो पवित्रता है...!!

- वृषाली सानप काले

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