क्या है आध्यात्म..? (भाग-14) [परमपिता परमात्मा भाग 1]

परमपिता परमात्मा भाग १
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जिस तरह एक जानवर का पिता जानवर होता है। इंसान नहींं होता उसी तरह एक आत्मा का पिता जो होता है वो भी आत्मा ही होता है। अर्थात मनुष्य देह में स्थित सभी आत्माओं का भी एक पिता होगा। जो सभी आत्माओं से श्रेष्ठ व महान भी होगा। आत्मा जैसे निराकार है वैसे ही आत्मा का बाप अर्थात पिता भी निराकार ही होगा वो निराकार बाप  ही  "परमपिता परमात्मा" है...!! 

वो निराकार परमात्मा जो सभी आत्माओं का बाप है वो जाहिर है बच्चो से थोड़ा तो अलग होगा। वो परमात्मा देह में कभी भी नही बंधता, इसीलिए वह न कभी जन्म लेता न कभी मरता है। वह अजेय, अमर, अनंत, अविनाशी, निराकार व अलौकिक शक्तिरूप है...!! जो इस सृष्टि का निर्माता, रचैता, रक्षक, एवं वही इसका विनाश भी करता है, निश्चित समय के पश्चात...!! शांति, सुख, आनंद, प्रेम, शक्ति, पवित्रता, ज्ञान, सत्यता का सागर है परमपिता परमात्मा...!!

परमपिता परमात्मा जिसने इस सृष्टि की रचना की क्योँकि वही इसका रचयिता है। जो रचैता होता है वह रचना के भीतर नहींं आता बल्कि रचना के बाहर रहकर रचना का अवलोकन करता है...!! तो परमात्मा की रचना आत्मा है, सृष्टि है, ड्रामा अर्थात इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर होनेवाली मनुष्य कर्म की भूमि की भूमिका..., इन सब मेंं परमात्मा कैसे घुस सकता है। कैसे जन्म-मृत्यु में आ सकता है..??

जन्म व मृत्यु तो आत्मा की निश्चित होती है। क्योँकि पंच तत्व निर्मित हर वस्तु का विनाश निश्चित है। तो अन्य वस्तु के समान मनुष्य की भी मृत्यु निश्चित होती है व तत्पश्चात पुनर्जन्म भी..!! जिस सृष्टि की रचना विधाता ने की क्या वो उसके ही निर्मित किसी वस्तु के गर्भ से जन्म लेने लायक, योग्य कोई वस्तु हो भी सकती है...??

वस्तु तो मिटती है, नष्ट होती है, काटी जा सकती है, जल सकती है... परन्तु सृष्टि निर्माता को कोई गर जला सके, मिटा सकें, तोड़ सके, काट सके, मार सके तो क्या वो सृष्टि निर्माता हो सकता है....?? नहींं....बिल्कुल नही...!! सृष्टि निर्माता, रचैता कभी मिट नही सकता, जल नहींं सकता, कट नहींं सकता, क्योँकि वो शाश्वत, चिरन्तन, अनंत, अमिट, निराकारी तथा अत्यंत शक्तिशाली है...!!

इस सृष्टि की समस्त बाते निर्मित है, विधाता निर्माता है...!! निर्माता निर्मिति की निर्मिति कैसे हो सकती है...?? अर्थात मूर्ति, सृष्टि (चराचर), एवं मनुष्य में ईश्वर नहींं है...!! ओ पालनहार, हमरे सरकार, तुम बिन हमरा कौन नहींं.. तो यह महिमा किसकी है.. बिगड़ी को बनाने वाले की। आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज सुनाने वाला परम् पिता है ऊंच ते ऊंच..!! ऊंच ते ऊंच भगवान् गाया जाता है। ऊंच ते ऊंच यह उनका नाम भी है, ऊंच ते ऊंच उनका ठांव (रहने का स्थान) भी है। ग्रंथ में भी है ऊंचा जिसका नाम ऊंचा जिसका ठांव। ऊंच ते ऊंच रहने वाला है परमपिता परमात्मा। वह है निराकारी दुनिया, जहाँ निराकार परमपिता परमात्मा रहते हैं। फिर नीचे है आकारी और साकारी दुनिया। तो पहले-पहले परिचय उनका ही होना चाहिए । 

परमपिता परमात्मा तो है ही ट्रूथ। वही है रचयिता। फिर है उनकी रचना। ऊंच ते ऊंच बीजरूप, फिर उनके नीचे सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा-विष्णु-शंकर। वह भी है रचना। अर्थात ब्रह्मा, विष्णु व शंकर के भी वो बाप है, पिता है..!! रचयिता ही सबके ऊपर है। वह रचयिता है बाप, निराकार परम् पिता.. बाकी है रचना...!! सब एक ही परमपिता परमात्मा की सन्तान हैं, इसलिए हम आत्मायें सब भाई-भाई ठहरे। वो परमपिता परमात्मा परमधाम में रहते हैं। उनको ही परमात्मा कहा जाता है। शारीरिक पितायें तो बहुत होते हैं ना। जो जन्म देता है वो जिस्मानी बाप होता है, लौकिक बाप होता है...!! जिस्म के बाप समान आत्मा का रूह का भी बाप होता है.. उसे कहते है ..रूहानी बाप ...!! रूहो का बाप परमात्मा...!! हम सब है उनकी ही सब रचना।

तो पहल होते  है ऊंच ते ऊंच परमपिता परमात्मा, जिसको मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का चैतन्य बीजरूप कहा जाता है। वह सत्-चित-आनंद स्वरूप है। सत अर्थात् सच कहने वाला। आत्मा भी सत है, वह भी जलती-मरती नहीं। सत के बच्चे भी सच्चे होने चाहिए। आत्माएं सबसे पहले सच्चे देवी-देवता थे। इसीलिए वो सच खण्ड होता है । सचखण्ड स्थापन करने वाला सच्चा परमात्मा है। परमपिता परमात्मा झूठ खण्ड स्थापन नहींं करते हैं, केवल सच खण्ड की स्थापना के लिए वे आते है। भारत ही सचखण्ड था अब फिर  से यह भारत झूठ खण्ड बना है। 

सच्चा परमपिता परमात्मा सच्चाई की ही प्रतिष्ठापना करता है..!! पतित बनाने वाले को सच्चा नहीं कहेंगे। जो आत्माओं को पतित बनाती है, वह है माया..!! जो सब हैं झूठे उन्हें अधिक झूठा 5 विकार रूपी माया झूठा बनाती है। उसे ही रावण का युग कहते है। राम का राज्य अर्थात सच्चा राज्य 'राम राज्य' माने सतयुग व आधा राज्य झूठा राज्य रावण झूठ सो कलियुग व द्वापर का राज्य 'रावण राज्य'..!! रावण ही भारत को झूठा बनाते हैं। कहानी सारी भारत पर ही होती रहती है। समझने की बात है, भारत ही स्वर्ग था जो अब नर्क है। बाप को स्वर्ग बनाने वाला वा स्वर्ग का रचयिता कहा जाता है। सारी महिमा भी भारत की है। आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान भारत मे सुनाते हैं, जिससे ही हम त्रिकालदर्शी बनते है। इसको ही कहा जाता है - स्वदर्शन चक्र। यही सत्य है कि हम आत्मायें फिर से परमपिता परमात्मा से वर्सा ले रही हैं। गाया भी जाता है आत्मायें और परमात्मा अलग रहे बहुकाल। अभी यह मिलन बहुत सुन्दर मंगलकारी है।

रचयिता बाप को सर्वव्यापी कहने से फिर कभी यह सिद्ध नहीं होता कि हम सब परमात्मा के बच्चे हैं। बच्चे ऐसे नहीं कह सकते कि हम सब परमपिता परमात्मा के सच्चे बच्चे हैं। कारण की वो अब तक उसको नहींं जानते है।सर्वव्यापी कहने से बाप के साथ वह लव नहीं रहता, न बुद्धियोग रहता है। भारत का प्राचीन योग मशहूर है। वास्तव में बुद्धि का योग लगाना है बाप से। सर्वव्यापी है तो फिर योग किससे लगायें? क्या अपने आपसे लगायें? कोई अर्थ ही नहीं निकलता। यहाँ तो अब हम सब अर्थ सहित जानते है। बाप खुद कहते हैं मेरे साथ योग लगाने से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। विकर्म तो होते रहते हैं।

सम्पूर्ण कर्मातीत अवस्था अन्त में होगी। जब ज्ञान का अन्त होगा तब रिजल्ट निकलेगी। स्कूल में भी कोई किस सब्जेक्ट में तीखे जाते हैं, कोई किसमें तीखे जाते हैं। सहज सब्जेक्ट है याद की। बाप को याद किया जाता है। याद से फिर आत्मा अच्छी होगी। बर्तन साफ होगा। आत्मा जो इमप्योर बनी है वह प्योर बनती जायेगी। ऊंच ते ऊंच बाप आकर पढ़ाते हैं और ऊंच ते ऊंच पद प्राप्त कराते हैं। हम मनुष्य से देवता बनते है। समझते हो कि बरोबर आदि सनातन देवता धर्म था। देवता धर्म को  हिन्दू धर्म नहीं कहेंगे। हिन्दू धर्म नाम ही शोभा नहीं देता, भारत का नाम ही बदलकर सबने हिन्दुस्तान नाम रख दिया है। 

आदि सनातन पवित्र देवी-देवता धर्म था, जिसको वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग कहा जाता है। वही तो सतयुग है। उसको ही कहा जाता है नई दुनिया। उनको रचने वाला बाप है। वह है निराकार। सभी कहते भी हैं ओ गॉड फादर। ऊपरवाला देख रहा है...!! ऊपरवाले की काठी जब गिरती है तभी सच सामने आएगा...!! ऊपरवाले के यहां देर है अंधेर नही ...!! ये हमेशांं ऊपरवाला ही क्योंं होता है ..?? नीचेवाला क्योंं नही होता..?? अर्थात आत्माएं जानती है कि उनका बाप ऊपर रहता है, नीचे नहींं...!! क्योँकि वह तो बाप है, श्रेष्ठ है, तो वे ऊंच ते ऊंच रहते हैं। आत्मा का बाप कौन है? ऊंच से ऊंच तो केवल भगवान् को ही कहा जाता है ना..?? 

सभी सदा प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना को रिक्वेस्ट भी कहा जाता है। ओ गॉड फादर, है परवरदिगार, है भगवान, है परमेश्वर, या अल्लाह, या रब्ब, है खुदा.. .हम अर्जी करते हैं, हमारे पापों को दग्ध करो और रहमदिल भगवान रहम करो। ऐसे-ऐसे पुकारते हैं। रहम कौन करते है..? रहम सभीपर तो नहीं करेंगे..? सब पर रहम करने वाला तो एक ही बाप है। सर्वोदया कहते हैं ना। वह क्या करते हैं? कितने पर रहम करते होंगे। गीता भागवत में यह बातें बिल्कुल हैं नहीं। गीता तो केवल है 'पवित्र  ज्ञान', बाकी किसी चरित्र आदि की तो कोई भी दरकार नहीं। 

परमपिता की केवल महिमा करने से कोई भी फ़ायदा नहीं। बाप की सिर्फ महिमा करना - वह ज्ञान का सागर है, सुख का सागर है इससे हम सदैव परमात्मा से जुड़े रहते है, परन्तु विकार परिवर्तन ही प्रमुख है।  परमात्मा हमको राजयोग सिखलाए त्रिकालदर्शी बनाता है अर्थात् तीनों कालों और तीनों लोकों की नॉलेज देता है। जिन्हें हम मास्टर त्रिलोकी के नाथ भी कहला सकते है। त्रिकालदर्शी भी कहला सकते है। बरोबर उनके द्वारा हम तीनों लोकों को जानने वाले नाथ बनते हैं। यह राजयोग है। हम बादशाह बनते हैं। बनाने वाला बाप है। पारसनाथ कहते हैं ना। वह है लक्ष्मी-नारायण, भल उन्हों के मन्दिर हैं लेकिन मनुष्य जानते नहीं कि यह कौन हैं? आज वे भी कही न कही मनुष्य समान जन्म ले जी रहे होंगे। लक्ष्मी-नारायण हैं पारसपुरी के नाथ। पारसपुरी सतयुग को कहा जाता है।

सतयुग में हीरों-जवारतों के महल थे। पारसनाथ युक्त थे। इन सभी का रचयिता बाप है। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर का भी वही रचयिता है। पहले तो मन मे यह निश्चय करो कि वह बाप ही  स्वर्ग का रचयिता है। स्वर्ग में आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले थे। उन्हों को यह नॉलेज कब मिली? किसने दी यह भी प्रश्न है ..?? परमात्मा कहते हैं कि मैं कल्प-कल्प संगमयुग में ही आता हूँ खुद अपने बच्चोको नॉलेज देने।

आज की इंसानी बुद्धि जानती है कि लक्ष्मी-नारायण आदि देवी-देवतायें कितने धनवान थे। बहुत जेवर आदि थे। बड़े साहूकार भी तो थे। तो पहले-पहले बाप को जान उनकी याद से वर्सा लेना ही ईश्वर की कृपा लेना  है। यही प्रमुख सूक्ष्म बात  है। सृष्टि का रचयिता ही सब रचता है। कब कैसे किस तरह इस ज्ञान के पहले उस रचयिता को जानना इसीलिए जरूरी है। परमात्मा को जानना व परमात्मा का बनना यहींं पवित्रता की प्रमुख विधि है। इसीलिए परमात्मा सदैव  कहते है मुझे याद करो। इस याद की योग अग्नि से ही हम पतित से पावन बनते है और कोई उपाय नहीं है। योग अग्नि से आत्मा पतित से पावन बनती है। पतित को पावन करने का कार्य ही बाप परमपिता का प्रमुख कार्य है। बाप ही आकर पतित आत्माओं को पावन बनाकर पावन दुनिया स्थापन करते हैं। जिसे स्वर्ग कहते है। 

गंगा तो एक पवित्र जल देनेवाली पावन नदी है, परन्तु गंगा नहाकर कोई पावन नहींं बनता। जप, तप, गंगा स्नान आदि करना यह सब भक्ति मार्ग की सामग्री है। भक्ति मार्ग पहले अव्यभिचारी होता है, अंत मे वही पूर्णता कर्मकांडी होता जाता है। फिर व्यभिचारी बनता है।

आत्माएं 16 कला सम्पूर्ण होती है फिर षट्विकारो से ग्रस्त होते होते 14 कला फिर पूरी कलायें अंत तक कम होती जाती हैं। जब पूर्ण कलाये समाप्त होती है तो आत्माएं पूर्ण व्यभिचारी बन जाती है। यह ज्ञान भी आत्माओं को सागर ज्ञान दाता शक्ति दाता परमपिता परमात्मा ही समझाते हैं।

आत्मायें सत्य से अपरिचित होती है परन्तु सदैव परमपिता परमात्मा बाप को ही याद करती रहती हैं, जब उनको दु:ख होता है। पूरी जीवनयात्रा में मनुष्य गुरू करते हैं। ईश्वर कृपा की अभिलाषा से ही ना ..। परन्तु गुरु भी तो इंसान ही होते है ना। एक इंसान कभी दूसरे इंसान को सद्गति दे ही नहींं सकता...। केवल सबका बाप.. अर्थात परमपिता परमात्मा ही सद्गति देता है..!! सद्गुरु न मुक्ति देता है न जीवन मुक्ति। उनको भी जीवन मुक्ति परमात्मा ही देते है। गुरु भी आज कहाँ गुरु कहने के योग्य बनते है..?? इंसान जहां आया, विकार वहां आये तथा विकारों के संग दुर्बलता आयी जहां दुर्बलता आयी वहां ही अधोगति आयी। क्योँकि हर दुर्बलता पर विजय पाने के लिए इंसान हर तरह की कोशिश करता है फिर वह सही हो या गलत...!! इसी कारण कोई भी गुरु ईश्वर तो नहींं ही नहींं परन्तु ईश्वर प्रतिरूप भी नहींं होता...!! 

गुरु तो केवल खुदा का बन्दा होता है..!! फरिश्ता होता है..!! खुदा का नेक बच्चा होता है..!! मैसेंजर ऑफ द गॉड होता है..!! बाप तो बाप ही होता है..!! बच्चा कभी बाप हो ही नहींं सकता..!! बाप ही आत्मोंं को मुक्ति जीवन मुक्ति अव समस्त पापों से भी मुक्ति देते है। बाप ही आत्माओं को उनकी नष्ट हुई 16 कि 16 शक्तिउओ को धारण करने योग्य बनाते है। बाप ही ज्ञान धारणा योग की त्रयी से सर्व गुण सम्पन्न बनाते है। परमधाम, अंतिम धाम, शांति धाम इन आत्माओं के घर मे उनके कर्म अनुसार उनके धाम में भी बाप ही लेकर जाते है..!! आत्मा खुद आसमान में उड़ ही नहींं सकती तो स्वर्ग कौन व कैसे जाएगी..?? आत्माओं को आसमान के नीचे जमीन पर धरती पर भी बाप ही भेजते है तथा जमीन से आसमान के ऊपर भी बाप ही लेकर जाते है..!! आत्माएं जीवन मेंं एक ही बार धरती पर आती है, फिर धरती पर ही जन्म मरण के चक्र में कर्मगति अनुसार जीती रहती है..!! तथा समस्त आत्माओं को एक ही वक्त जीवन मे में एक ही वक्त परमात्मा ही आसमान के ऊपर की उस विशाल दुनिया मेंं लेकर जाते है...!! आत्मा अकेले जा ही नहींं सकती...!!

 अन्य कोई भी गुरु साथ में नहीं ले जायेंगे। हर एक आत्मा को पुनर्जन्म जरूर लेना पड़ता है। 84 जन्म के इंसानी पार्ट में तो आना ही है। परमात्मा तो कभी भी घड़ी-घड़ी जन्म ही नहीं लेते है। अगर परमात्मा भी घड़ी-घड़ी जन्म ले लेंगे तो आत्मा के समान  तमो प्रधान भी बन जाएंगे इतना ही नहींं तो आत्मा व परमात्मा में फर्क ही क्या रहेगा...!! आत्मा तो सदैव इमप्योर बनती है। उसमें  तो विकारों की खाद पड़ती है। फिर उन विकारों से आत्माओं को मुक्त बनाकर फिर से प्योर बनाना यही तो परमात्मा का काम है..!! पापग्रस्त व भृष्ट दुनिया को पवित्र बनाना एवं पुरानी सृष्टि को नया बनाना - यह बाप का ही काम है। 

 बाप ही पतित-पावन है अर्थात् सृष्टि को बदलने वाला है। सृष्टि का रचयिता नहीं, बदलने वाला है। रचने वाला कहने से मनुष्य समझते हैं बड़ी प्रलय होती है। परन्तु ऐसा नहींं वो तो परिवर्तित करता है। वो पतित-पावन  है। साधू लोग भी गाते हैं पतित-पावन सीताराम, ऐसे तो कभी नहीं कहते कि पतित-पावनी गंगा। पतित-पावन कहने से बुद्धि परमात्मा की तरफ चली जाती है। गंगा तो पतित-पावन है नहीं। वह तो केवल पानी है ।

जब 5 तत्व सतोप्रधान नहींं होते अर्थात विकारों के वश में आने के कारण उनकी सतोप्रधानता समाप्त होती है, तब उन 5 तत्व व उनके बीच जीवन जीता विकारी मनुष्य इन्हें पावन, पवित्र बनाने का कार्य परमात्मा का होता है।जब ये सब पवित्रता में परिवर्तित होता है उसे ही सतयुगी दुनिया याने स्वर्ग कहते है ...!! ये स्वर्ग का सुख देने वाला बाप ही परमपिता परमात्मा कहलाता है...!! अभी तो इस धरती पर पूर्ण नर्क है। सृष्टि रूपी रंगमंच एक बहोत बड़ा माण्डवा है - आकाश तत्व का। इसमें खेल होता है, ओपेन स्टेज चाहिए ना। मनुष्य पार्ट बजाते हैं तो रोशनी भी चाहिए। इसके लिए फिर सूरज, चांद सेवा करते हैं। सितारे भी चमकते हैं। जब रात होती है तो रोशनी अर्थात् सुख देते हैं इसलिए सूर्य देवता, चांद देवता कहते हैं। रोशनी आदि का सुख वही तो हमे देते हैं ना।

परमात्मा के प्रेम से आत्मा का थोड़ा भी पुराना खाता अर्थात् बाह्यमुखता का खाता संकल्प वा संस्कार रूप में भी नही रखता। सदा सर्व बन्धनमुक्त और योगयुक्त बनाकर अन्तर्मुखता की सूरत द्वारा आत्माओ को प्रसन्नचित् बनाता है। जो आत्माओं को परिवर्तन द्वारा संकल्प, बोल, सम्बन्ध, सम्पर्क में सफलता प्राप्त करना ही सफलता-मूर्त बनाता है। उस निराकार परमात्मा अर्थात बाप से आत्मा का मिलना, मिलने की विधि को सीखना व करना इसी का नाम है.."मैडिटेशन"..!!ध्यान...!!

परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है, हम परमात्मा को सर्व व्यापी कह कर ईश्वरीय सत्ता को गाली देते हैं!!! परमात्मा यानी सर्व आत्माओं में परम आत्मा...!! जिनको हम कहते है की ये हर जगह और हर जीव में विद्यमान है! सूअर, कुत्ते, बिल्ली, गाय, गधे में सब जगह मौजूद है! एक दुष्ट आदमी में और एक क्रूर आदमी में भी परमात्मा मौजूद है! जरा सा तो सोचो...की दरअसल ये कहना ही परमात्मा को कितनी बड़ी गाली देना है! परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है! 

अगर एक क्रूर आदमी के अन्दर परमात्मा है तो वो क्यों क्रूर होता है? क्या परमात्मा के गुणों में क्रूरता का भी एक गुण है? एक व्यक्ति जो किसी को बेवजह मौत के घाट उतारता है या जघन्य अपराध करता है, तो उसके अन्दर विद्यमान परमात्मा कहाँ सोता है? परमात्मा के गुण कहाँ रहते हैं! जैसे अगर एक इत्र की शीशी खुली छोड़ दी जाए तो उसकी खुशबु से पता चलेगा की इत्र की खुशबु है! ठीक वैसे ही परमत्मा के गुण हैं शांति, दया, प्रेम, करुना, ज्ञान, अगर क्रूर व्यक्ति में परमात्मा का वास है तो वो गुण क्यों नहीं! 

परमात्मा अगर सब मेंं विद्यमान है तो अवतरित होने की क्या आवश्यकता है, जबकि सबमेंं पहले से मोजूद हैं? अवतार लेना अर्थात दूसरी जगह से आना, दूसरी जगह से आना अर्थात यहाँ ना होना ! हम परमात्मा की संतान हैं उस नाते उनके गुण हमारे अन्दर हो सकते हैं पर परमात्मा नहीं! शास्त्रों में भी इंसानों ने लिखा हैं "आत्मा सो परमात्मा" जिसका हमने गलत अर्थ लगाया की आत्मा ही परमात्मा है। यहाँ पर आत्मा और परमात्मा के रूप की बात कही गयी है "आत्मा सो परमात्मा" का तात्पर्य है जैसा रूप और आकर आत्मा का है वैसा ही रूप और आकार परमात्मा का है! अत: परमात्मा को सर्व व्यापी कहना अर्थात गाली देना है! परमात्मा कौन है और कैसा है? ये सवाल अक्सर हमारे मन में आता है, इसकी कुछ अलग अलग मान्यताएं है !

ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा आत्मा की ही तरह है जैसे आत्मा एक ज्योतिस्वरूप अंडाकार और अति सूक्षम जो स्थूल आँखों से देखि नहीं जा सकती है। ठीक परमात्मा का भी वैसा ही आकार वैसा ही रूप और उतने ही सूक्ष्म है। क्यूंकि परमात्मा हम सभी आत्माओं के पिता है। जैसे लौकिक में आदमी और उसकी संतान आदमी ही होती है, गाय की बाछी गाय ही ही होती है, ठीक उसी प्रकार आत्मा के पिता परमात्मा भी आत्मा जैसे ही होते हैं। फर्क है तो ये की उनकी शक्तियाँ असीमित है। 

आत्मा ज्ञान स्वरुप है तो परमात्मा ज्ञान के सागर है, आत्मा शांति स्वरुप है तो परमात्मा शांति के सागर हैं। आत्मा प्रेम स्वरुप है तो परमात्मा प्रेम के सागर है। कहने का तात्पर्य ये की परमात्मा सभी दिव्य गुणों के सागर हैं, और सृष्टि के रचियता है।

सदियों से भगवान के बारे में वाद-विवाद चलता आ रहा है। कुछ लोग भगवान, के बारे में सभी मान्यताओं को नकार देते हैं। कुछ लोग मरते दम तक भगवान में श्रृद्धा रखते हैं और कभी-कभी कुछ लोग ऐसी भी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, "क्या फर्क पड़ता है"? इन्श्योरेन्स कम्पनियाँ आज भी आपदायें, मतभेद, लड़ाईयाँ, गाली-गलौज आदि को ‘एक्ट ऑफ गॉड' (परमात्मा द्वारा उत्पन्न किया गया संकट) मानते हैं। लेकिन क्या सचमुच मनुष्य निर्मित यह घटनायें और मनुष्य की गलतियों के लिए भगवान को जिम्मेदार माना जा सकता है? जीवन में जो भी अलौकिक, दिव्य और अकल्पित घटनाएं घटती हैं, उनके बारे में, आप के मन में, अब तक तो कुछ ज़रूर कुछ मान्यताएँ बन गई होंगी। वास्तविकता में चाहे कोई कुछ भी करे या कहे, यह हम पर निर्भर है कि हम भगवान किस रूप में स्वीकार करें या फिर उस के अस्तित्व को ही नकार दें। 

दिव्य सत्ता पर ध्यान केंद्रित कर जाने की विधाता की विधि मानव खेल से पूर्णतः पृथक और श्रेष्ठ है, इससे जिज्ञासु व्यक्ति ईश्वरीय खण्ड के बारे में एक नया दृष्टिकोण अपना सकेंगे व स्व उन्नति कर सकेंगे...!! ज्ञान व तर्क से जुड़े अगर दिलेर एवं निष्पक्ष होंगे तो आपका मन, सुगमता और स्पष्टता से, विभिन्न विकल्पों को परख सकता है। परमात्मा एक प्रकाश का स्वरूप है। परमात्मा का संदेश रूपी मन मनाभव यह संस्कृत मंत्र हमारे मन को अनुशासित करता है। मनमनाभव अर्थात अपने मन को एक परम सत्ता, एक परमात्मा पर एकाग्र करें। यह ज्ञान और याद का सार है और जीवन का सच्चा अमृत है। मनमनाभव यह विधि है परमात्मा को पहचानने की, उस परम् आत्मा का बनने की और उस परम् आत्मा से प्यार करने की...!!

 - वृषाली सानप काले

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