स्पष्टीकरण

रिश्तो में गाँठ पड़ने से कई बार नाराजगी पैदा होती है। फिर कोशिशें शुरू होती है। अंदाजा लगाया जाता है।क्योंं..?, कैसे..?, कब..?, काहे..?, किस लिए..?, क्या वजह..? आदि कई बातें आ जाती है। फिर सफाई दी जाती है। कभी विवाद छिड़कता है। कभी स्पस्टीकरण भी जगह लेता है।

स्पस्टीकरण...क्योंं देना पड़ता है..? भरोसा कम पड़ता है इसलिए..?? लेकिन वो तो रिश्ता है ना..?? रिश्ते में अनबन क्योंं..? सफाई क्योंं..?? हम कभी ईश्वर को सफाई देते है क्या..? उसके साथ तो सबसे बड़ा रिश्ता होता है। क्योँकि उसे अपने बच्चो पर एवं हमे उस पर उसकी शक्ति व ताकत्वपर पूर्ण भरोसा होता है।

जहां भरोसा होता है वहां सफाई की जरूरत नही होती। जहां भरोसा होता है वहां शिकायत पैदा ही नहींं होती। जहां भरोसा होता है वहां बिन कहे कई सारी बाते अपने आप ज्ञात हो जाती है। क्योँकि वो रिश्ता दिल से जुड़ा हुवा होता है। व्यक्ति को व्यक्ति जैसा है वैसा ही स्वीकारा जाता है। उसके गुण एवं अवगुणों के साथ। व्यक्ति के स्वीकार के बाद, उसके अस्तित्व के स्वीकार के बाद जब उसे प्रेम दिया जाता है, तब शिकायत काहे की..!!अनबन काहे की..!! अविश्वास काहे का..!! ये रिश्ता होता है..!!

परन्तु सदियो से हमे यही संस्कार दिया गया है कि, जहाँ अपनापन होता है, वही झगड़ा होता है। जहां रिश्ता होता है, वही अनबन होई है। जहां प्यार होता है, वही शिकायते होई है..!! सो यही संस्कार स्वीकार हम युगों से जिये जा रहर है, परिणामता आज रिश्ता ही लुप्त हो गए है..!! प्रेम के लिए सामान्य जनमानस से लेकर गर्भ श्रीमत के साथ अति ज्ञानी समस्त लालायित है..!! सफाई केवल झूठ के लिए जरूरी होती है। सत्य को प्रमाण की जरूरत नही होई तथा सत्य सफाई भी नही देता। प्रेम सफाई से नहींं भरोसे से बनता है। प्रमाण के मोहताज नहींं होता।

ज्ञान की गंगा को सही तरीके से प्रवाहित न करने के कारण आज समाधान, शांति, प्रेम जैसे शाश्वत एवं अमिट मूल्यों को जगत खो चुका है..!! इसी का ही तो नाम कलियुग है..!!

 हम सदैव दुसरो में बदलाव लाने की चाह रखते है। हम सदैव दुसरो में सुधार लाना चाहते है। हम सदैव दुसरो को ग़लत कहते है। खुद को ही सही कहते है। वास्तव में हर व्यक्ति की अपनी एक विचार धारा तथा संकर धारा होई है। जो उसके अनगिनत जन्मोंं से चली आ रही होती है। जिसे किसी के कहने से कोई भी नहींं बदल सकता। हर व्यक्ति के अपने वर्तन से किसी न किसी को तकलीफ होई ही है। जो वर्तन करता है वो उसके संस्कारो के अनुसार सही होता है। जिसे अनुभूति आती है उसे अगर उससे दुख होता है, तो वो उसके संस्कारो के अनुसार...! संस्कारो को बदलना हर व्यक्ति का अपना निर्णय होता है। फिर वो कौनसे भी संस्कार क्योंं न हो, परन्तु हर अवस्था मेंं व्यक्ति उन्हें बदल सकता है, अगर दिल से वो व्यक्ति खुद चाहे तो..!! किसी भी व्यक्ति को कोई अन्य परिवर्तित कर नहींं सकता वह केवल बदल होने लायक हालात पैदा कर सकता है। जब आँख  खुले तभी सबेरा ..!!  इसी के अनुसार क्योंं न खुद बदले तब जग बदलेगा..!!
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- वृषाली सानप काले

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