अध्यात्म क्या है? (भाग - 14) पवित्रता - २

पवित्रता वास्तव में एक कड़वी व गहन तथा अनमोल कुंजी है। जो ईश्वर द्वारा मनुष्य को प्राप्त हुई है। मनुष्य के सुख का प्रवेशद्वार भी पवित्रता ही है। इस सांसारिक जीवन के संसार में सबसे श्रेष्ठ और उच्चतम सुख अगर है, तो वह है पवित्रता का...!! पवित्रता की स्थिति का अभ्यास व अनुभव सतना सहज साध्य व सहज प्राप्त भी नहींं होता। जिस  अनुभव की प्राप्ति ही सबसे श्रेष्ठ और शक्तिशाली  स्थिति  है। पवित्रता शब्द जितना सहज है उतनी सहज उसकी स्वीकृति नहींं होती। क्योँकि काया, वाचा व मन से किसी का भी दुश्चिन्तन न करना यह बात जन्मजन्मांतर के संस्कार में सिखाई नहींं जाती है। परिणामवश आत्मा को इसकी अनुभूति के लिए दिव्य व कठिन अवस्थाओं से भी गुजरना पड़ता है। पवित्रता ही वो स्थिति है जिसमे शांति निहित है। क्योँकि पवित्रता के बाद ही शांति का आगमन होता है। पवित्रता मौन को लेकर आती है। जब मन से दुसरोंं के लिए कोई बुराई ही नहींं रहती तो मुख, मन, बुद्धि, चिंतन सब मूक मौन हो जाते है। इनकी मौनता के बाद अपने आप शांति की अवस्था निर्माण होती है। जिस स्थिति में गहन सुखयुक्त शांति अनुभूति देती है..!!

   पवित्र रहना एक आह्वान लगने के कारण कई लोग इससे दूर भागते है। कईयोंको संपूर्ण पवित्र बनना असंभव सा भी  लगता है, लेकिन जैसे जैसे हम दृढ़ता के साथ इस मार्ग पर अग्रसर होते जाते है, वैसे वैसे हमें ये मंजिल बिलकुल समीप दिखाई देती है। कोई भी बात जब रोजाना नित्य रूप से की जाती है तो वो सफलता दे ही जाती है।

पवित्रता वास्तव में मनयुष्य को दिव्यता की तरफ ले जाती है। दिव्यता व देवता बनाने व बनने की पहली व प्रमुख सीढ़ी ही पवित्रता है। जब व जैसे जैसे हम पवित्र होने लगते है, तब यह स्मृति पक्की होने लगती है...अनायास याद भी आने लगता है... की निश्चित मैंं ही इस संसार की उन श्रेष्ठ तथा दिव्य आत्माओंं में से एक हु..जिन्हें ईश्वर का प्रेम, स्नेह व आस्था का उपहार मिला है। मैं ही वो आत्मा हुंं जिसे ईश्वर ने चुना है..!!जितने गम्भीरता वतीव्रता से दूसरों के लिए अविरत हम शुभ भावना व शुभ संकल्प देते जाएंगे उतने ही हम अधिक गति से पवित्र होते जाएंगे। जितने जल्दी हम स्वयं को कर्मातीत, सम्पूर्ण पवित्र बनायेंगे उतने ही जल्दी हम पावन बन सृष्टि व विश्व को पावन बनाने के ईश्वरीय कार्य मेंं सहभागी हो फिर दिव्य युग में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते है...!!

पवित्रता सत्य व दिव्यता का अनमोल गहना है। पवित्रता की परिभाषा बड़ी गुह्य और विशाल है। पवित्रता की धारणा पर कर्मो की गुह्य गति भी बहुत कुछ निर्भर करती है। पवित्रता यह दुनियादारी में मशगूल दुनिया के लिए जरा कठिन है। परन्तु ये बेहद की ताकत का निर्माण साधको में कर देती है..!! भले दुनियादारी की दृष्टि से कोई गरीब हो परन्तु पवित्रता धारण करनेवाले ये भगवान् के बच्चे तो आत्मिक संपत्ति से इस संसार में अति धनवान, सबसे अधिक अमीर है। उनके पास इस संसार की सबसे अमूल्य पूंजी है - पवित्रता...!! जो तन, मन, धन, विचार, आचार, संस्कार, कर्म में पवित्र बनाती है। जिसके आत्मा को छूते ही आत्मा की चमक बढ़ जाती है।प्राचीन व जीर्ण संस्कार नष्ट होते है। विकार दूर निकल जाते है। सादगी व सच्चाई की ताकत मजबूती से उसकी रौनक बढ़ाते है। इसलिए इसे एक बार पाने के बाद हर हालत में इस पूंजी को जतन करना है, चाहे कुछ भी हो जाये लेकिन आत्मा को इस धारणा से हटना नहीं है। क्योँकि तभी इसकी शक्ति विकसित होगी। चाहे सब कुछ त्यागना भी क्योंं न  पड़े...तैयार रहे, परन्तु इस अमूल्य पूंजी से कभी भी मुंह मोड़ने की कल्पना भी नहींं करनी चाहिए।

 इस व्यवहारिक जीवन मेंं स्वार्थ प्रवृत्ति व कर्मकांड युक्त जीवन को जीनेवालो  मनुष्यों का जीवन मूल्यहीन है, नैतिकता विहीन है। श्रेष्ठ चरित्र युक्त जीवन को ही मूल्यवान कहा जाता है। उच्च से उच्च धारणा पवित्रता है और यही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य भी होना चाहिए, केवल तभी सर्व सुखी व प्रेमयुक्त होंगे। जब सभी पवित्र बनेंगे तो अन्याय कौन करेगा..?? दुख कौन देगा..?? आंसू क्यो बहेगा...?? तभी तो सृष्टि स्वर्ग बनेगी।जैसे ही जीवन से विकारों की मात्रा कम होने लगती है, तभी ही आत्मा बेहद के अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने लगती है। अतीन्द्रिय सुख की स्थिति में शरीर स्थूल परन्तु आत्मा मन और बुद्धि से  सदा परमात्मिक शक्ति से ही जुड़ी रहती है। जिसके कारण सदैव ये आभास होता है की जैसे कोई हमसे यह  काम करा रहा है, कोई शक्ति हमें प्रेरणा दे रही है. हमारे मन को  संकल्पों को प्रवाहित करने के साथ ऊर्जा मिल रही है।

संसार में सबसे अधिक भाग्यशाली वे आत्माए हैं, जो सम्पूर्ण निर्विकारी बन गयी; क्योंकि ऐसी महान आत्मओंको  कदम-कदम पर स्वयं भगवन साथी बनकर साथ देते हैं। जिन्हें स्वयं प्रभु का संग सदा के लिए प्राप्त होता है। ऐसी स्थिति में भला उन्हें इस संसार की छोटी-छोटी इच्छाए आसक्ति कैसे आकर्षित कर सकेंगी? जिन्होंने भगवान को प्राप्त कर लिया हो, उन्हें और कोई कामना हो भी कैसे सकेंगी? ऐसी आत्माए ही सच्चे अर्थ में इच्छा मात्रं अविद्या हो जाती है। पवित्रता की इस महान प्राप्ति को छोड़ किसी अन्य व  अर्थहीन प्राप्तियों के पीछे भाग कर सारा जग अपना समय बर्बाद कर रहा है। संसार की नज़रों में स्थूल जगत में चाहे कोई कितना भी उंच बने परन्तु जब तक भगवान की नजर उस पर न पड़े तब तक का जीवन व्यर्थ ही है...!! तथा बेकार है। पवित्रता की चमक ही ईश्वरीय नज़रों को आकर्षित करती है, क्योंकि ऐसी पवित्र आत्मा सर्व प्रकार के हद के आकर्षणों से मुक्त होती है..!!

पवित्रता एक बड़े से बड़ा त्याग भी है तो बड़े से बड़ी प्राप्ति भी है...!! जीतना-जीतना आत्मा विकारों का त्याग और गहन तपस्या करती जाती है, उतना उस में पवित्रता का बल आ जाता है. इस बल के आधार से असंभव को भी संभव होता जाता देखा जा सकता है...!!

 शास्त्र कहते हैं पवित्र व्यक्ति पर वज्र भी गिरे तो, सारी दुनिया दुश्मन बन यो भी कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकता। "वज्रात्  त्रायते इति पवित्रः।जो पवि अर्थात् वज्र से भी रक्षा करे, उसका नाम है पवित्र। वज्र पवित्र व्यक्ति का स्पर्श नहीं कर सकता।"

प्राचीन शुभ संस्कार की विधि है कि प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठें तब जरूरत लगे तो लघुशंका, शौचादि करके अथवा ऐसे ही थोड़ी देर तक बिस्तर पर बैठकर ब्राह्ममुहूर्त का सदुपयोग करें, पवित्र चिंतन करें क्योंकि सोते समय सभी वासनाएँ शांत हो जाती है एवं जागने के बाद धीरे-धीरे उदित होती हैं। प्रभातकाल में नींद उड़ी है, सांसारिक वासनाओं का उदय अभी नहीं हुआ है – ऐसे समय में यदि अपने आत्मस्वरूप का, परम सत्य परमात्मा का चिंतन करोगे तो खूब-खूब लाभ होगा। जैसे विद्युत के प्रवाह के साथ जुड़ते ही बैटरी चार्ज (आवेशित) हो जाती है ऐसे ही प्रातःकाल में अपने चित्त एवं जीवन को पवित्र करने वाले आत्मा-परमात्मा के साथ थोड़ा सा भी संबंध जुड़ जाय तो हृदय में उसकी शक्ति का आविर्भाव हो जाता है। वह जीवनशक्ति फिर दिन भर के क्रिया-कलापों में पुष्टि देती रहेगी।

प्रभात काल में यदि बहुत सुस्ती लगती हो, शरीर में अशुद्धि हो तो भले स्नान करके फिर आत्मचिंतन के लिए बैठो, परमात्म-स्मरण के लिए बैठो लेकिन नित्य कर्म के नाम पर दूसरी खटपट में नहीं पड़ना। सबसे पहले परमात्मा का ही चिंतन करना परमावश्यक है क्योंकि सबसे पवित्र वस्तु परमात्मा है। परमात्मा के चिंतन से बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है। यदि ब्राह्ममुहूर्त में 5-10 मिनट के लिए आत्मा-परमात्मा का ठीक स्मरण हो जाय तो पूरे दिन के लिए एवं प्रतिदिन ऐसा करने पर पूरे जीवन के लिए काफी शक्ति मिल जाय।

 मन की पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ पवित्रता है। मन की पवित्रता से संपूर्ण शरीर की पवित्रता संभव है। अधिकतर लोग शरीर को पवित्र बनाने के बारे में सोचते रहते है परंतु मन की पवित्रता के बारे में सोचते भी नहीं है। वास्तव में मन की पवित्रता से दैनिक दिनचर्या में होने वाले कर्मों में भी पारदर्शिता और पवित्रता की झलक साफ दिखाई देती है।

सफलता और असफलता बहुत हद तक मन की स्थिति पर निर्भर रहती है। उसे कोई हरा नहीं सकता। मन की पवित्रता से ही मनुष्य अपने मन को एकाग्र कर सर्व इंद्रियों पर विजय प्राप्त करता है। भगवान ने भी गीता में कहा है कि जो व्यक्ति मन से पवित्र और निश्छल होता है वही मुझे प्रिय है। इसीलिए अपने स्मरण और प्राप्ति के संबंध में 'मनमनाभव' के मंत्र को ही सर्वश्रेष्ठ याद की विधि बताया है। क्योंकि जब तक हमारा मन पवित्र नहीं होगा ईश्वरीय याद और परमात्मा की मदद नहीं ले सकते, मुक्ति और जीवनमुक्ति की बात तो दूर है।

मन एक अनमोल शक्ति है, जिसको सही तरीकेसे प्रयोग में लाने से ही मन शक्ति रूप में प्रकट होती है।
मन के संदर्भ में कई बातें आज तक हमने सुनी हुई है।किसी ने मन को घोड़े के समान चंचल बताया है तो किसी ने मन को शैतान तक कह दिया है। किसी ने मन को बच्चे की भाँति बताया है तो किसीने मन को गागर भी कहा है।इतना ही नही तो किसीने मन को सागर से विशाल भी व सागर से गहरा भी कहा है। क्योँकि मन चंगा तो कठौत में गंगा..!! परंतु मन तो आत्मा की तीन शक्तियों मन, बुद्धि और संस्कार में से एक है। यह मन तभी कार्य करता है जब आत्मा शरीर धारण किए रहती है। मन का कार्य निरंतर सोचते रहना है। सोचना, चिंतन करना, अर्थता देना, व लेना यही मन की शक्ति है। इस शक्ति की दिशा सही हुई तो मन शक्तियुक्त बनता है व नही मिली तो मन दिशा हीन हो जाता है।मन की एक दुर्बलता भी होती है, कि मन अधिक से अधिक बीती हुई बातों पर चिंतन करता है। इसीलिए मन को सदैव ज्ञान की जो उसका खाद्य है, जरूरत होती है।

  24 घंटे के दौरान अपने भूत-भविष्य और वर्तमान के बारे में सोचना मन का कार्य ही है। सोच में अच्छा और बुरा दोनों हो सकता है परंतु अच्छे और बुरे का निर्णय बुद्धि करती है। बुद्धि की निर्णय शक्ति पर फिर कर्म होता है और कर्मों के सही व गलत स्वरूप के परिणाम से ही दुख-सुख, पाप-पुण्य, यश-अपयश की प्राप्ति होती है जिससे ही मनुष्य के सही  व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

 वास्तव में आत्मा की सम्पूर्ण प्रवास यात्रा ही कर्म पर अवलम्बित है। जैसा कर्म वैसा फल, जैसी करनी वैसी भरनी, कर्म की गुह्यतम गति ही आत्मा की तकदीर बनाती है। क्योंकिआत्मा को शरीर छोड़ने के बाद भी यदि याद किया जाता है तो सिर्फ उसके कर्मों के फल के आधार पर। कहा जाता है कि मन के हारे हार और मन के जीते जीत। अर्थात जो मन से हार जाता है उसका अपना भी पराया हो जाता है और जो मन पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है उसके लिए संसार की कोई भी वस्तु अप्राप्त नहीं होती है। फिर उसकी जीत तो पक्की है। अर्थात मन, बुद्धि संस्कार के कारण मनुष्य कर्म कर अपना प्रारब्ध बनाता है। यही चिरसत्य है, इसीलिए आत्मा को पवित्रता जरूरी है। तन, मन व कर्म की पवित्रता अर्थात काया, वाचा व मनसा पवित्रता। इन सबमे जरूरी तन की भी पवित्रता है।

पवित्रता का पहला सम्बन्ध विकारों से है।पवित्रता अर्थात विकारों से मुक्त जीवन..!!जिनमे माया के लाखों शिपाहियो में प्रमुख है...काम,क्रोध,लोभ,मद,मोह,मत्सर,घृणा,अहंकार..आदि। इन सबका प्रमुख लीडर है...काम...!! आज सारी दुनिया काम के वश में है। जहां काम आया, वहां क्रोध, लोभ, अहम, मोह आदि सब धीरे धीरे आ ही जाते है...!! उसी प्रकार अगर काम ही निकाल दिया तो क्रोध, लोभ, मोह, अहम...आदि सब धीरे धीरे निकल ही जाते है..!!

  काम आत्मा का केवल समाज निर्मिति की प्रक्रिया का एक साधन है..!! आज मनयुष्य ने उसे साध्य बना दिया है। हर तरफ केवल काम का ही अधिराज्य व मांग तथा साम्राज्य फैला हुवा है..!! पवित्रता अर्थात इस काम भाव को ही अपने जीवन से पुरुन रूप से निकाल देना है..!!

 विवाहित हो या अविवाहित हो इस काम को छोड़ना ही सच्ची पवित्रता है..!!
 काम को छोड़ना अर्थात अपनी इंद्रियों को कई हद तक वश में कर लेना है...!!

इंद्रियां वश में आई तो मन आया, मन आया तो बुद्धि भी आई। जब बुद्धि व मन वश में आया तो कर्म तो अपने आप मे वश में आया... अर्थात तब कर्म की गति सत्कर्म पद्धति से ही चलने लगेगी... मतलब विकारों से मुक्त...!! यह विकारों से मुक्त आत्मा जब पाप ही नही करेगी तो दुखी कैसे होगी व दुख कैसे देगी...?? जो आगे चलकर देवता स्वरूप बन जाएगी...!! इसीलिए पवित्रता सभी सुखों की जननी है...!!


- वृषाली सानप काले

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