क्या है अध्यात्म (भाग - 13) मन की पवित्रता -१

पवित्रता कोई शब्द नहीं वो एक जीवन पद्धति है।पवित्रता एक शक्ति है। ऐसी शक्ति जो जीवन के साथ साथ जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्त कराती है। एक ऐसा प्रवाह जो इंसानी रूहानियत को जगाकर उसे फरिश्ता बना देती है। उसके कई शास्वत पहलू है। जिसे आईने की पारदर्शिता से देखना व समझना आवश्यक है। सीधी बात से देखकर हम गहराई तक जाएंगे। जिस तरह जमीन अच्छी है खाद भी बेहद अच्छी है, परंतु 'पानी' अगर 'खारा' हो तो फूल खिलते नहीं। भाव अच्छे हो कर्म भी अच्छे हो मगर 'वाणी' खराब हो तो 'सम्बन्ध' कभी टिकते नहीं।

     इसलिए सदैव मन ऐसा रखे व पेश करे कि किसी को बुरा न लगे। दिल ऐसा पाक रखे कि किसी को दुःखी न करें। मन से प्रेम करे। रिश्ता ऐसा रखे  कि उसका कभी अंत नहीं हो। कोई भी व्यक्ति हमारा मित्र या शत्रु बनकर संसार में नहीं आता.. वास्तव में  हमारा व्यवहार और शब्द ही लोगों को मित्र और शत्रु बनाते है। आत्मा के पूर्व कर्म तथा गलत प्रवृत्ति व संस्कार से ही एक आत्मा दूसरी आत्मा की विरोधक एवं अविचारी बनती है।

ये मशहूर कथा तो  हम सब जानते ही है। एक बार इंसान ने कोयल से कहा "तूं काली ना होती तो कितनी अच्छी होती ...?? सागर से कहा की, तेरा पानी खारा ना होता तो....??? कितना अच्छा होता"??.. गुलाब से कहने लगा, "तुझमें काँटे ना होते तो कितना अच्छा होता" तब तीनों एक साथ बोले: "हे इंसान अगर तुझमें दुसरो की कमियाँ देखने की आदत ना होती तो तूं कितना अच्छा होता..??" संसार में ऐसे समानेवाले पाक, पवित्र, नेक, सरल, व सच्चे इंसानों की बेहद कमी है, जिसे बढाना जरूरी है।

जो कुछ मात्रा में होते भी है तो समाज उन्हें समझने की हैसियत नहीं बढ़ा पाता। जो ज्ञान व प्रेम युक्त नम्रता को प्रयोग कर सबको माफ़ करता है, अन्य उसे डरपोक, बेकार कह हंसी उड़ाते है।परन्तु जो 'आपकी-खुशी' के लिए 'अपनी हार' मान लेता हो, उससे 'आप' कभी भी नहीं 'जीत' सकते...!! दुनिया की कोई ताकत भी उससे जीत नहीं सकती। किसी का भी सरल स्वभाव कभी उसकी कमज़ोरी नहीं होती है। संसार में पानी से सरल, पवित्र, व सच्चा तो कुछ भी नहीं है, परन्तु सरलता की गतिशीलता व निरन्तरता की शक्ति का बहाव सदैव बड़ी से बड़ी चट्टान के भी टुकड़े कर देता है ..!!! सच्ची पूण्यवान व पवित्र आत्मा कभी पूण्य कार्य के बदले प्रशंसा की अपेक्षा नहीं रखती क्योंकि उसे पता है अभी कुछ पाना आगे की सदा काल की प्राप्ति से वंचित होना। इसलिये वह हद की कामना नहीं रखते। वह सदा अपने हर बोल द्वारा सबको को खुशी  और रूहानी जीवन आनंद का अनुभव कराते है। आगे बढ़ने वाला व्यक्ति कभी किसी को बाधा नहीं पहुंचाता, दूसरों को बाधा पहुंचाने वाला, बुरा सोचनेवाला, तकलीफ देनेवाला व्यक्ति कभी आगे नहीं बढ़ता।

     कोई अगर आपके अच्छे कार्य पर  सन्देह करता है ... आपकी बदनामी करताय है। तो करने देना,विचलित न होना क्योकि... शक़, सदा सोने की शुद्धता पर ही तो किया जाता है.. कोयले की कालिख पर नहीं...!

मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? किसने किया?? काहे को किया..?? मेरा कसूर क्या...?? जैसे कई सवाल मन मे जन्म लेते है। परन्तु जैसा कर्म वैसा फल। यह तो कुदरत का नियम है, जो जैसा करेगा वैसा पायेगा। जैसी करनी वैसी ही भरनी होती है।हमारा वर्तमान जो भी तथा जैसा भी है उसके जिम्मेदार सिर्फ हम है, क्योंकि वह बीते कल के हमने किये कर्म का फल है। और आज के लिये नहीं परन्तु सुनहरे कल के लिए आज हम जैसा कर्म करेंगे वैसा हमारा भविष्य बनेगा।

सोचना, बोलना, सुनना, देखना यह सब कर्म में आता है।  जो मुख्य क्रियाएं है, इसलिए हमें अच्छा सोचना है, अच्छा बोलना है, अच्छा करना है। श्रेष्ठ कर्म का आधार धर्म है। कर्म करते वक्त किसी के भी प्रति मन मे कटुता न हो। शांति, प्रेम, दया, करुणा, पवित्रता, आत्मिक भाव यही श्रेष्ठ धर्म है।
दुआ दो दुआ लो तथा सुख दो सुख लो। यही सच्चा जीवन है।

लोग समझते हैं, कि नरम दिल वाले बडे बेवकूफ होते हैं ! जबकि सच्चाई यह है कि नरम दिल वाले बेवकूफ नहीं होते बल्कि निहायत नेक इंसान होते है। वे बखूबी ये जानते हैं, कि लोग उनके साथ क्या कर रहे है! पर हर बार लोगों को माफ करना ये उस आत्मा की आदत भी तथा स्वभाव ही उसकी विशेषता है..! जिससे यह जाहिर होता है, कि वो एक खूबसूरत “दिल”का  मालिक हैं... और जो रिश्तों को सँभालना बखूबी जानता हैं! ये विशेष आत्मा की विशेष बात ही तो विश्व मे पवित्रता की अलौकिक शक्ति है...!!

- वृषाली सानप काले

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