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Showing posts from October, 2018

अध्यात्म क्या है? (भाग - 14) पवित्रता - २

पवित्रता वास्तव में एक कड़वी व गहन तथा अनमोल कुंजी है। जो ईश्वर द्वारा मनुष्य को प्राप्त हुई है। मनुष्य के सुख का प्रवेशद्वार भी पवित्रता ही है। इस सांसारिक जीवन के संसार में सबसे श्रेष्ठ और उच्चतम सुख अगर है, तो वह है पवित्रता का...!! पवित्रता की स्थिति का अभ्यास व अनुभव सतना सहज साध्य व सहज प्राप्त भी नहींं होता। जिस  अनुभव की प्राप्ति ही सबसे श्रेष्ठ और शक्तिशाली  स्थिति  है। पवित्रता शब्द जितना सहज है उतनी सहज उसकी स्वीकृति नहींं होती। क्योँकि काया, वाचा व मन से किसी का भी दुश्चिन्तन न करना यह बात जन्मजन्मांतर के संस्कार में सिखाई नहींं जाती है। परिणामवश आत्मा को इसकी अनुभूति के लिए दिव्य व कठिन अवस्थाओं से भी गुजरना पड़ता है। पवित्रता ही वो स्थिति है जिसमे शांति निहित है। क्योँकि पवित्रता के बाद ही शांति का आगमन होता है। पवित्रता मौन को लेकर आती है। जब मन से दुसरोंं के लिए कोई बुराई ही नहींं रहती तो मुख, मन, बुद्धि, चिंतन सब मूक मौन हो जाते है। इनकी मौनता के बाद अपने आप शांति की अवस्था निर्माण होती है। जिस स्थिति में गहन सुखयुक्त शांति अनुभूति देती है..!!
   पवित्र रहना एक आह्वान …

कलाम जी

आँख मेरी नम हुई जब तुम्हे ही खो गई... तू ही था आँखों का तारा तू था जग से ही  न्यारा..।।
तू ज्ञानी बड़ा ज्ञान से तू मानी बड़ा मान से... तू था सागर ऋदय तू ही था प्रेम संगम...।।
तू ही हमारा  गुरुर तू ही देश का सुरूर.. आँख नमी है जरूर दिल तड़पे मजबूर...!!
देश तूने ही सवारा हर हल को किनारा.. देश ऋणी है तुम्हारा.. कैसे भूले उपकारा..।।
 कलाम का ये कलमा सजे भारत का अंगना.. तिरंगे के ही रंगमा हरे धर्म-जाती खात्मा..।।
- वृषाली सानप काले

कलाम जी

हम सदा ऋणी है तुम्हारे ओ प्यारे कलाम जी हमारे..।।
प्रति दिन प्रति पल क्षण न भुलाया कभी जीवन.. शिक्षक का वो अभिमान शिक्षा के प्रति योगदान.. नस नस से उतरे तुम्हारे..।।1
युवको पे तेरा वो भरोसा काँधे पे रखा था हमेशा.. कठिन डगर में भी जोश जिंदादिली का ही होश.. तेरे शब्द ही हमे सवारे..।।2
ज्ञान की पहचान दिलाई अह्मभावना ना रे छु पाई.. शीतलता की लहर लाई आज तेरे लिए ये रुलाई.. झुके तेरे आगे आँखे हमारे..।।3
- वृषाली (सदैव ऋणी एक शिक्षिका)

अग्निपंख

महासत्तांक बनेगी जो इंडिया तब तुमको ही ढूंढेगी दुनिया.. अब ना खुलेगी तुम्हारी निंदिया देख भारत बना तेरा बढ़िया...!!
मिसाईल मैन तुम्हारी हर खूबी नसनस से वाकिफ दुनियाबखूबी जब भी ये मुश्किल में हो डुबी बस तुमको ही तो याद था किया
युवको की ताक़त तेरे अग्निपंख सबकी हिम्मत तेरे इरादे बुलंद नवनिर्माण पे तू ही था अडिग हमने बस तुमको सलाम किया।
अंतिम क्षण तक न विश्राम किया नाम भारत का ही रोशन किया गर ज्ञानी तेरे ज्ञान कोमान दिया कर्मयोगी ने विराम जो लिया सारे जग को ही झुका दिया...।।
- वृषाली सानप काले

क्या है अध्यात्म (भाग - 13) मन की पवित्रता -१

पवित्रता कोई शब्द नहीं वो एक जीवन पद्धति है।पवित्रता एक शक्ति है। ऐसी शक्ति जो जीवन के साथ साथ जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्त कराती है। एक ऐसा प्रवाह जो इंसानी रूहानियत को जगाकर उसे फरिश्ता बना देती है। उसके कई शास्वत पहलू है। जिसे आईने की पारदर्शिता से देखना व समझना आवश्यक है। सीधी बात से देखकर हम गहराई तक जाएंगे। जिस तरह जमीन अच्छी है खाद भी बेहद अच्छी है, परंतु 'पानी' अगर 'खारा' हो तो फूल खिलते नहीं। भाव अच्छे हो कर्म भी अच्छे हो मगर 'वाणी' खराब हो तो 'सम्बन्ध' कभी टिकते नहीं।
     इसलिए सदैव मन ऐसा रखे व पेश करे कि किसी को बुरा न लगे। दिल ऐसा पाक रखे कि किसी को दुःखी न करें। मन से प्रेम करे। रिश्ता ऐसा रखे  कि उसका कभी अंत नहीं हो। कोई भी व्यक्ति हमारा मित्र या शत्रु बनकर संसार में नहीं आता.. वास्तव में  हमारा व्यवहार और शब्द ही लोगों को मित्र और शत्रु बनाते है। आत्मा के पूर्व कर्म तथा गलत प्रवृत्ति व संस्कार से ही एक आत्मा दूसरी आत्मा की विरोधक एवं अविचारी बनती है।
ये मशहूर कथा तो  हम सब जानते ही है। एक बार इंसान ने कोयल से कहा "तूं काली ना …

सियासत

काहें को ये दरमियां क्यो  सियासत भी उसुल से खेले है
मक़सद दुजा तो  कोई भी नहीं मुझे तो बगावत भी लागे  फ़िजूल है...!!
जहां रियासत कसबे रौदे हो... तथा सियासत मौके तौले हो... बेकार ही बेकार वहा न्याय क्या हो न अंत सही न सही आगाज हो...!!
जबसे होश है सवारा.. जन्म भाषा को दिया किनारा.. सिसके तेरे लिये कतरा-कतरा.. न जता की इबादत भी फ़िजूल है...??
अजब कमाल है युगो से  वो करते जाते है.. अजब गुमान है युगो से  हम सहते जाते है...
खामोशी से सहते  गये  की अब तो मसले सुलझ जाये... बंद होठो के सहारे से सोचे की मौन रहे  के न उलझ जाये
हद मे बरसे या  की बेहद मे... बारीश तो पानी है लहू से ही घायल सारी 'तेरी कहानी है...!!
जो नायाब भी है  अनमोल भी है... है पर आज भी  वही प्रश्न तू बेखॉफ क्यो न है..??
जो चाहे, जब चाहे, भरी गली, खुली सडक में.. तुझे रौदे, तोडे, तुझे लूटे  हम फिर भी ... खामोश क्यों है..??
बे अब्रू कर 'तेरी बेइज्जती  के जशन मे  जहर पिते ये आँँख नम क्यों है...??
तुझसे हे बेइंतहा चाहत तेरे लिये ये बगावत  बस तुझसे ही उलफत ये पाकीज अदावत क्यों है..??
कण कण से तुटे सब्र से छुटे.. फिर भी माँ ह…

मुस्कुराते ज़ख्म

खंजर से चाहे छल्ली कर दो सिना मेरा, मुस्कुराकर ज़ख्म सह लेंगे इश्क़ का।
मेरी रूह तुझ में ही सुकून पाती है, अब तू ही बता कहां जाए ये लिए।
दूर रहकर भी तेरी चाहत की आश लिए, जीते जी मर जाएंगे हो कर तुझसे जुदा।
जिंदा कर देता तेरी नज़र के जाम तेरी एक मुस्कान पे वारू सारा जहां।
घायल मन पर मेरे लगाया है तूने, प्यार का मरहम लगा किया जिंदा।
दिल पर राज करती है तेरी यादें, मिलने की तेरी आश रखें है जिंदा।
************ - कौशल्या वाघेला