क्या है अध्यात्म..?? (भाग ४) "आत्मा एवं मौन"

आत्मा की अष्ट शक्तियां ही उसकी पहचान है।सहनशक्ति, समाने की शक्ति, परखने की शक्ति, निर्णय की शक्ति, सहयोग की शक्ति, सामना करने की शक्ति, विस्तार से संकीर्ण करने की शक्ति तथा समेटने की शक्ति ये शक्तियां ही आत्मा को सर्व शक्तिमान बनाती है। इनका विकास व मजबूती ही आत्मा की परिचायक है। जिनमेंं से एक भी शक्ति अगर कमजोर हो जाये तो आत्मा को समस्याओं का सामना करना पड़ता है तथा उनमें से बाहर निकलने में अड़चनें आ जाती है।

इन  शक्तियों की उपासक आत्मा जीवन मे कभी भी हार नहींं जाती तथा विध्वंसक नहींं बन सकती। इन शक्तियों की उपासक आत्मा सदैव सत्य व ईश्वर के समीप होती है। इनके साथ साथ आत्मा के कुछ विशेष गुण भी होते है। जो उसे परिपक्व बना देते है। जो इन शक्तियों के साथ मोल जाए तथा साधना से जुड़ जाए तो आत्मा को देवी शक्तियों की प्राप्ति से कोई भी पीछे नहींं खींच सकता।

प्रेम, शांति, ज्ञान, पवित्रता, आनंद, सुख व शक्ति ये गुण समय व कर्म अनुसार प्रालब्ध अनुसार विद्यमान होते हुए भी लुप्त हो जाते है। उन्हें परखना, संवारना, संजोना, निखारना व विकसित करना ये आत्मा का प्रथम कर्तव्य है। क्योँकि आत्मा तो स्वयं वास्तव में एक पवित्र शक्ति है।सच्चा सोना है, जिसमेंं कठिन से कठिन  तख्त़ को भी पलट देने की ताकत होती है। उसे ज्ञात नहींं कि वो कितनी शक्तिवान है। उसे कई कर्म विकारों ने व उनके कर्मफलों ने बिगाड़ा है, उसे शुद्ध करना जरूरी है। अग्नि में तपाने से ही सोने को शुद्ध किया जा सकता है। किसी भी तरह के कचरे को अग्नि नष्ट करती है, भस्म करती है। शरीर से आत्मा निकल जाने के बाद देह को नष्ट करने का काम भी अग्नि ही कर देती है। अग्नि सारे किचडे को जलाकर भस्म कर देती है। इसी प्रकार आत्मा को पवित्र बनाने के लिए योग ही अग्नि है।

जन्म से लेकर मनुष्य इस ज्ञान से परे रहता है ,सो अंधकार में आत्मा भटक जाती है। केवल परमात्मा की अविरत याद से ही आत्मा का जन्म-जन्मान्तर का मैल धुल सकता है। इस मैल को धोने के लिए उसे देह अभिमान को पूर्णता छोड़ना होगा। जबतक ये देह अभिमान होगा, अगर मनुष्य पवित्र ही नहींं बन सका तो परमात्मा से मिलने की बात तो कोसो दूर है।

सदियो से मनुष्य ने आत्मा को भुला दिया है। जो भी ज्ञान व कर्म तथा संस्कारो को देने की बात होती है वह केवल शरीर तक ही सीमित है। सो अनायास ही आत्मा का अस्तित्व व्यावहारिक जगत से लुप्त करा दिया गया है। देह अभिमान की अवास्तव महत्त्वता ही मनुष्य को ध्वस्त कर देती है। देह अभिमान उसे संकुचित एवं मर्यादित व स्वार्थी बना देता है।

शरीर व शरीर के लिए मैं और मेरेपन का भान रखना ही "देह अभिमान" है। मैं देह हु इसे याद रखना अर्थात पद को याद रखना। मैं अति सुंदर, शक्तिशाली, अमीर, ज्ञानी, पुरुष, महान, पुत्रवान, धनवान, बुद्धिवान, उच्च पदाधिकारी, वकील, डॉक्टर, सम्पत्तिवान, भाग्यवान हूँ किसी से भी लड़ना- झगड़ना, नवाबी के घमंड चलना, कोई भी बात पर झट बिगड़ पड़ना, कोई भी उल्टे-सुलटे कार्य करना व नुकसान करना तथा मुफ्त में बदनामी ले लेना, दुसरो पर अपना अहंकार दिखाना, अपने को व दूसरों को दुःख व दर्द ही देते रहना, अपनी देह को सजाते  संवारते रहना व दुसरो की देह प्रति आकर्षित होना व किसी के नाम-रूप में फंसना, इन्द्रिय सुखोंं के पीछे भागना व भोगना, आसुरी संस्कारों (अवगुणों) का बार बार पालन करते रहना, सदैव बुद्धि को व्यर्थ बातो में इधर-उधर भटकाना, बार-बार रोना, रूठना, तनाव में आना, दुखी होना, समस्याओं में घिरना, कष्टों में अपने को अनुभव करना महसूस करना, कर्मेन्द्रिय की सुखों में लगे रहना और अतिइन्द्रिय सुखोंं का लोप होना ये समस्त संकेतो का मतलब ही देह अभिमान आता है।

जीवन में पहले देह अभिमान अता है, फिर उसके पीछे-पीछे विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, मद, घृणा  और अहंकार) आते हैै। फिर धीरे धीरे अन्य विकार भी साथ-साथ आने लग जाते है। सभी अवगुणों, आसुरी वर्तियो, दुखोंं, दर्दो, कष्टों, पतन आदि का मुख्य बीज ही तो देह अभिमान है। अत:सबसे पहले इस देह अभिमान को जड़ से समाप्त करने के लिए तीव्र पुरषार्थ करना चाहिए। तभी इन सब से आत्मा काे छुटकारा हो सकता है। वह फिर से अपनी लुप्त शक्तियों को प्राप्त कर सकती है।

   अपनी लुप्त शक्तियों को प्राप्त करने के लिए आत्मा को प्रथम स्वयं को अनुशाशन में रखना होगा। जिसके लिए जरूरी है वह मौन को अपनाए।

मौन-- मौन मनुष्य जीवन की ताकत है। परन्तु इंसान उस शक्ति का इश्तेमाल सही पद्धति से न करने के कारण आज पीड़ा एवं त्रासदी युक्त जीवन जी रहा है।

मौन मतलब अंतर्मुखी होना। अंतर्मुखी बन जीवन को जीना। अंतर्मुखी होना अर्थात चिंतन करना स्वयम की  हर कृति व विचार का चिंतन करना। अपनी आत्मा तथा उसकी सकारात्मकता के प्रति एकाग्र होकर रहना ही अन्तर्मुखी बनना है। आत्म अभिमानी बनकर उस शक्ति के मूल के अंत मे खो जाना यही अंतर्मुखता है।

अंतर्मुखी लोग सदा सुखी होते है, क्योँकि वो जगत के विकारों को चिंतन का विषय नहींं बनाते। जो स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा की गति, शक्ति व कृपा की याद में मशगूल रहते हैं, जिस कारण से सदा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करते है, उसका आनंद बार बार संभालकर रखते है।

अंतर्मुखी होकर रहना इतना आसान भी नहींं तथा कठिन भी नहींं, तथापि उसकी उचित जानकारी का होना आवश्यक है। अंतर्मुखी होना याने व्यर्थ के विचारों को अपने मन व मष्तिष्क में बिल्कुल स्थान न देना। जो विचार नकारात्मकता व निरर्थकता की तरफ ले जाये उनसे बचना।

अंतर्मुखी अर्थात किसी भी बिकट स्थिति में भी बुद्धि बाहर की ओर ना भटके किंतु  सदा आत्म-चिंतन, आत्मा की उन्नति, परमात्म-चिंतन तथा पारमार्थिक स्थिति में लगी रहे।

अंतर्मुखी बनना याने यह नहीं की बस मुख का मौन स्वीकारना परन्तु अंतरतम में विचलित स्थिति को रखना। ऊपर से बर्फ परन्तु अंतर से अग्नि हो तो उसे मौन नहींं कहते। मौन में समस्त विघातक, व्यर्थ व नकारात्मक विचार नहींं चले, वे मौन रहे।

अंतर्मुखी होना व मौन रखना  माना व्यर्थ संकल्पों एवम् नकारात्मक  संकल्पों को मौन देना। अपने मन की व्यर्थ संकल्पों की शक्ति को परिवर्तित करके उन्हें समर्थ संकल्पों की ओर ले जाना, व्यर्थ के दुष्परिणामो से परिचित कराना। आत्म-कल्याणकारी और विश्व-कल्याणकारी संकल्पों की ओर ले जाकर उनसे सकारात्मक कृति करवाना यही सच्ची अवस्था मौन की है।

मौन के द्वारा अनेक क्रियात्मक  शक्तियां विश्व को चला रही है। प्रकृति को ही देखे तो सूरज, धरती, आसमान, पेड़, पर्बत, नदी, सागर सब अत्यंत मौन रूप से लगातार बिना थके बिना रुके अपना कार्य सफलता के साथ कर ही रहे है अर्थात मौन हमारी कार्यशक्ति को बढ़ाता है, मौन हमारी ऊर्जा की गति देता है, मौन हमे सफलता की सीढ़ियों तक ले जाता है, मौन विनाश व विध्वंसक विचारों को आने नहींं देता, मौन विकारों से बचाता है। जिस निराकार शक्ति द्वारा इस समस्त सृष्टि का संचालन व हिफाजत हो रही है, वो निराकार शक्ति भी तो मौन के द्वारा ही कार्य करती है। इतना ही नहींं उसका अस्तित्व सदैव ध्यान में भी ला डरती हसि।उस शक्ति का ही यो नाम निराकार परमपिता परमात्मा है। उस परमपिता के साथ बुद्धियोग रख गुणवान बनना यही मौन का प्रमुख काम है। इसलिए हमारी अन्तर्मुखता हमारी शक्ति भी है तथा सफलता भी।

   मौन से हम परिपक्व इंसान एवं सफल आत्मिक  जीवन की अनुभूति प्राप्त करते है। मौन सफल जीवन की अमोल कुंजी है। परमात्मिक शक्ति के प्रेम की अनुभूति को प्राप्त करना है तो मौन का गहना पहनना ही पड़ेगा।

- वृषाली सानप काले

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