क्या है आध्यात्म.(भाग--१) "आत्मा"

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आत्मा
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    ईश्वर की बनाई हुई इस सुंदर रचना की एक अनुपम कलाकृति अगर कोई है ,तो वो है "आत्मा.."!!
     आत्मा अपने आप मे केक सद्गुणों की खान है।ईश्वरीय गुणों से युक्त है,परन्तु अपने अनेक कर्म,कुकर्म,सुकर्म,सत्कर्म,पापकर्म आदि के चक्रव्यूह में फंसकर वो अपनी तमाम गुणों को खो चुकी है।अनेक दुष्कर्मो की वजह से दुर्गुणों की खान बन चुकी है।
    आत्मा व ईश्वर ये दोनों भी अति गुह्यतम विषय है।जिनके बारे में न कोई जानता है न कोई इस विषय पर बात करना पसंद करता है।परन्तु बावजूद इसके इस विषय की सही जानकारी हर एक को होना समय की मांग है,कारण की जिस देह की तमाम जरूरतों के पीछे मनुष्य पागलो की तरह भागे जा रहा है ,उस देह में स्थित आत्मा की पहचान हमे होना अत्यंत जरूरी है।
    आत्मा के ज्ञान का अध्यन जिस शास्त्र में किया जाता है ,वह है ,"आध्यात्म"!इस अध्ययन की शाखा को ही ज्ञान उपासको ने अभ्यास प्रणाली से हटा दिया है।अभ्यास से जुड़ी केवल दो शाखाएं रखी है--आधी भौतिक एवं आधी दैहिक ...!!एक मे समस्त सृष्टि का तो एक मे समस्त जीव जंतुओं के देह का अभ्यास किया जाता है।फिर देह को चलानेवाली उस शक्ति को जानना क्यो जरूरी नही लगा...??समाज व सृष्टि के ठेकेदारों को...??
    कारण की इस ज्ञान को केवल ज्ञान के रूप में ही नही स्वीकारना होता है,बल्कि साधना के साथ आत्मसात भी करना होता है।
   आध्यात्म का अध्ययन कई स्तर तक आत्मज्ञान से ही जुड़ा है।आत्मज्ञान मनुष्य को तभी प्राप्त हो सकता है ,जब वह अपनी समस्त पाप प्रवृत्ती, गलत संस्कार,दुश्चिंतन,बुरे विचार,बुरे आचार,जिव्हा के ग़लत प्रयोग आदि से मुक्त होता है,अर्थात काया ,वाचा,एवं मन से पूर्णता पवित्र बन जाता है ...!!
    आज के कलियुग का मनुष्य पवित्रता से कोसो दूर जा चुका है।ये केवल पुस्तको में ,दीवारों पर लिखने का एक सुंदर विचार बनकर रह चुका है..!!
 यही कारण है कि बड़ी ही सहजता के साथ स्वार्थ विचारक धारियों ने आध्यात्म को अभ्यास प्रणाली से दूर कर दिया ...!!ब्राम्हण व्यवस्था ने भी जो कि समाज को ब्रम्हांड के ज्ञान को देने वाले इसलिए ब्राम्हण "वास्तव में थे ,तथापि ये व्यवस्था भी केवल कर्मकांड व सम्प्रदायिक जाती तक सीमित रही।
   अर्थात आध्यत्मिक ज्ञान की धरोहर को न जतन किया गया न ज्ञान स्वरूप समस्त मनुष्यो तक पहुंचाया गया।
   इसी के परिणाम स्वरूप न मनुष्य आत्मा को जान सका न उसकी गरिमा को पहचान सका न उसके कल्याण के मार्ग पर चल सका न आत्मा की सात्विक शक्तियों का उपासक बन सृष्टि को अगतिकता से सुरक्षित कर सका।
  तो आइए हम इस विचार श्रृंखला में परिचित होते है--आत्मा, उसकी सोला शक्तियां, कर्म की गति ,कर्म गति के परिणाम तथा प्रालब्ध एवं कर्म संचित से....!!

-- वृषाली सानप काले

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