आध्यत्मिकता व राखी

राखी भारत वर्ष का एक अनोखा त्योहार है।राखी  केवल भारत की धरोहर तथा संपत्ति है।राखी अपने अंदर भारत के गहरे इतिहास व सत्य को लिए हुवे है।
भारत मे राखी केवल बहन ही भाई को बांधती है यह प्रचलित परम्परा है।
परन्तु वास्तव में यह एक ईश्वरीय अलौकिक बन्धन की सच्चाई लिए हुवे है।जिसे कोई भी नही जानता।
कुछ ऐसे ही सत्य व शास्वत विचार बतलाना मुझे जरूरी लग रहा है।
   सृष्टि के निर्माण,विनाश की प्रक्रिया का नियंत्रक वह है जो विश्व निर्माता है।जिसे हम परम् पिता परमात्मा कहते है।जो इस सृष्टि के अनंत आत्माओं का पिता है।इसलिए हमारा बाप है।जो समय,कर्म,न्याय,संस्कार के प्रति अत्यंत सतर्क है।
उसकी नियमावली के अनुसार इस सृष्टि के एक संपूर्ण आवर्तन को पूरा होने के लिए 5000 वर्ष का समय लगता है।जिसे एक कल्प कहते है।ऐसे केक कल्प आज से पहले हो चुके है।जब ऐसे एक कल्प की पूर्णता व नए कल्प की सुरुवात होने से पहले इस सृष्टि पर परमपिता परमात्मा का आगमन होता है।
   5000 वर्ष को साधारणतः 4 युगों में विभाजित किया गया है।एक युग 1250 वर्ष का है।सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग,व कलियुग ये चारों युग हम जानते है।लेकिन इनका स्वरूप व परिणाम नही।
तो इसमें से जब सत्य युग की सुरुवात होती है तब इस सृष्टि पर जन्म लेनेवाली आत्माएं वही होती है,जिनमे अत्यंत पवित्रता होती है।जो आत्मा की 16 शक्तियों से परिपूर्ण होती है।जैसे कि आत्मा को देह की जरूरत होती है ,तो वह देह आत्मा को सृष्टि के पंचतत्व से अर्थात प्रकृति से प्राप्त होती है।तो जाहिर है आत्मा के सदैव सम्पर्क में आनेवाली ये प्रकृति जिसे माया कहते है ,वह बार बार आत्मा पर हावी होने का तथा उसपर कब्जा करने का प्रयास करती है।सत्य युग मे माया का आत्मा पर अधिक असर नही होता।परन्तु त्रेता युग मे धीरे धीरे माया जैसे जैसे आत्मा पर हावी होने लगती है तो आत्मा अपनी शक्तियों का गवाने लगती है।
   जिसके परिणाम स्वरूप त्रेता युग की समाप्ति तक आत्मा के पास केवल 8 शक्तियां जीवित रहती है।
  परिणामता अगले युग मे अर्थात द्वापर युग की समाप्ति तक आत्मा के पास केवल 2 शक्तियां जीवित रहती है।माया आत्मा को पूर्ण रूप से कब्जा कर लेती है।
    अंतिम युग कलियुग कलियुग अर्थात काला युग।काली शक्तियों का युग अर्थात मनुष्य के समस्त जन्मों के कर्मो के हिसाब का युग।इस युग मे जिन आत्माओं के पास वो 2 शक्तियां जीवित होती है वे या तो उन्हें अधिक बढाते है या फिर माया के प्रकोप में जुड़कर उन्हें भी गवा देते है।हिसाब चुक्तु होने के कारण हर कोई दर्द में रहता है व माया का विकराल रूप होने के कारण समस्त मूल्य नष्ट होते से नजर आते है।जो नष्ट नही होते परन्तु उन्हें जताने के लिए खुदा के बन्दे फरिश्तों का निर्माण होना भी जरूरी होता है।
वह निर्माण केवल परमपिता परमात्मा करता है...!!
  इस पूर्ण सृष्टि चक्र में कर्म की गति करनेवाला एक्टर आत्मा होती है।जैसा आत्मा का क्रम होता है वैसा उसका प्रारब्ध बनता है।इसलिए हर आत्मा को 84 मनुष्य जन्म भुगतने पड़ते है।सत्ययुग मे 8 जन्म,त्रेतायुग मे 12 जन्म,द्वापरयुग मे 21 जन्म,तथा कलियुग में 63 जन्म लेने पड़ते है।क्योँकि सत्ययुग मे व त्रेतायुग में आत्मा पर माया का असर नही होता तो आत्मा 100 प्रतिशत से लेकर त्रेता के अंत तक 90 प्रतिशत तक पवित्र पूर्ण पाक होती है।जो संख्या के तौर पर 33 कोटि आत्माएं होती है।ये समस्त पवित्र आत्माएं ही हमारे 33 करोड़ देवी देवतायें है।सृष्टि चक्र में भेजी गई ये आत्माएं तभी वापिस ऊपर परमात्मा के घर जा सकती है ,जब स्वयं परमात्मा इस सृष्टि विनाश के बाद ले जाएगा।पाप,कर्म,व अनीति के कारण आत्माएं इतनी भ्र्ष्ट हो चुकी होती है कि स्वयं परमात्मा के पास जाने की ताकत ,योग्यता उनमें नही होती।
 ये जो कार्य है यह केवल परमात्मा ही करता है।परमात्मा ने किए हुवे वादे के अनुसार जब इस सृष्टि के विनाश का समय आएगा उस हर वक्त मूल्यों की स्थापना करने व पवित्रता का बंधन आत्मा से जोड़ने के लिए हर वक्त 4युग के बाद मैं अवश्य आवुगा। उसके आने का समय कलियुग के अंत मे होता है।कलियुग केवल 1100 वर्षो का होता है।100 वर्ष संगम युग का होता है।इस संगम युग मे ही परमात्मा साधारण मनुष्य के देह की सहायता के द्वारा अपने उन फरिश्ता स्वरूप आत्माओं को स्वयं ढूंढकर उनके द्वारा राजयोग सिखला कर अर्थात अपनी समस्त इंद्रियों को वश में कर योग के माध्यम से मनुष्यों को पीड़ा से मुक्त कर उन्हें उनके सात्विक गुणों को जगाकर परमात्मा का परिचय देकर नए सत्य युग मे जन्म लेने योग्य तैयार करवाता है।ये जो समय है यहां पवित्रता यह प्रमुख गुण है।काया,वाचा,व मन से ही मनुष्य अधिक से अधिक 84 जन्म तक पाप कर्म करता जाता है।जिससे वह खुद भी अनभिज्ञ होता है।खुदा मनुष्य को इसी काया,वाचा व मन से पवित्र बनाता है...!!ये पवित्र बनाने की विधि याने राखी...!!नारी नारी को,नर नर को नर नारी को,नारी नर को,वृद्ध,बच्चे समस्त इस धागे में खुदा बांध लेता है व हर आत्मा को राख्ने की गवाही देता है,इस राखी के द्वारा..!!क्योँकि ईश्वर कभी भी किसी भी आत्मा को वह कितनी भी पापी हो सजा नही देती ,उस आत्मा के कर्म उसको सजा देते है।परमात्मा तो आत्मा को उसके जैसा केवल पवित्र पाक प्रेम युक्त व दयावान बनाना चाहता है।आत्मा को मुक्ति व जीवन मुक्ति भी कोई भी मनुष्य आत्मा नही देती।केवल परमपिता परमात्मा ही आत्मा को मुक्ति व जीवन मुक्ति देता है।इस 5000 वर्ष के कल्प की समाप्ति का यह अंतिम पर्व है।खुदा को इस सृष्टि पर आकर 98 वर्ष कबके हो चुके है।तो जाग जाइयेगा।खुद ही आत्म चिंतन से जानिएगा आप खुद उन 33 करोड़ देवताओं में से कौन हो...??
ये राखी आपको वही याद दिलाने के लिए है।
रक्षाबंधन भगवान के प्रेम में हमें बाँधनेवाला एक पवित्र धागा है, सब शरीर के बंधन और भौतिक दुनिया से हमें मुक्त, और सुरक्षा और संरक्षण की भावनाओं के साथ हमें भरता है।हमारी भावनाओं में हर आत्मा के लिए शुद्ध और ऊंचा रखने

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- वृषाली सानप काले 

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