संवादात्मक कथा - "मूल्य"

   "कई बार इस नम्बर से कॉल आ रहा है..?
आखिर किसका हो सकता है...? गलत व्यक्ति का तो नही होगा...? चलो उठा ही लेती हूं...!"
"हैलो.. कौन..?"
"दीपक श्रीवास्तव...बोल रहा हूं, पूजा...जानती हो मुझे...?"
"....जी..."
"शुक्र है पहचान तो लिया..."
"कैसे हो आप सब...?"
"..खुश तो सब है री, पर ये बता तू फोन क्योंं नहींं करती...?"
"आप लोग भी कहाँ करते हो भाई...?"
"पर तु क्योंं नहींं करती..? जो भी कुछ भड़ास हो तुम्हारे मन मे वो बोल दो मुझसे, कुछ भी मन मेंं न रख खुल के बोल, इसके बाद तुमने बात भी नहींं की तो भी मैं तुमसे नाराज नही रहूंगा। तुम्हारी खामोशी दिल को चीर जाती है..लाखो ख़ंजर ख़ौप देती है।"
"..कुछ नही भाई, सब ठीक है यहां..."
"कुछ ठीक नहींं है, तू तड़प रही है मैंने भाई होकर महसूस नहींं किया पर तुम्हारी भाभी ने महसूस किया है। तुम दर्द पीती रही हो आजतक आज तुम्हे बताना होगा मुझे, बोल भी दो बहना..."
"भाई दिल दुखेगा आपका .."
"दुख जाने दो, मुझे सम्भालनेवाला है यहां..तू बोल..."
"भाई, मैं क्योंं करु फोन बोलो न आप..? जब भी फोन करती हूं माँ से लेकर दोनों बहनें, बड़े भाई, भाभी सब लोग क्या बाते करते है, आप नहींं जानते क्या..?
भाई आप सब वहाँ बम्बई में रहते हो मैं अकेली आप सब से दूर हुंं तो बोलो न कायदे से किसे फोन करना चाहिए..?"
"...."
"भाई, जब भी फोन करती हूं सभी मिलकर केवल मेरे पति, मेरे बच्चे, मेरा परिवार तथा उनके स्वभाव, किसी न किसी बात को लेकर नुक्ताचीनी करते है..!"
"पूजा..."
"मेरा भी दिल है भाई, मेरी गरीबी को टारगेट करते है। मेरी की हुई हर बात को गलत साबित करने का मौका उठाते है...!"
"अरे,तू भी न..."
"हांं भाई, ये कुछ एक दो वक्त का अनुभव नहींं है भाई ये हर पल का अनुभव है। ऐसा एक बार भी नहींं हुआ की किसी न किसी ने कुछ इस तरह से नही कहा होगा.."
"पूजा, तू हमारी है, तेरे प्रेम, फिक्र की दृष्टि से भी कहा होगा न कुछ, गलत न समझ..."
"मैं तुम्हारी हुंं तो मेरा पति..? मेरा परिवार..? मेरी शादी आप लोगो ने ही तय की न..?? आप लोगोंं ने ही ढूंढा न दूल्हा..? आप को तब भी पता था न कि दूल्हा उसका परिवार गरीब है, साँवला है...?तब क्यो किया फिर पसंद..?? मुझे ये बातेंं बार बार सुनाकर ठेस पहुंचाने के लिए..?"
"ऐसा नहींं है पूजा..मेरी बहन...!"
"पापा के दोस्त के यहां पापा ने उन्हें नॉकरी दिला दी, ठीक है न..वो काम करते है, तभी शासन उन्हें तन्ख्वाह देती है, है न...? तो वे मेरे मायके के सभी लोगो के नॉकर कैसे हो गए भाई..?"
"..."
"भाई अरे टॉवेल को हाथ लगाया तो भी उनसे झगड़ा किया गया है। मेरे पति की हैसियत की बात हज़ार बार की गई है मेरे मायके के लोगो से...!"
"पूजा, अरे सुन तो..."
"भाई, पूजा अगर आपकी थी, तो उसका पति आपका क्योंं नही बना..? उसके बच्चे कम प्रति के क्योंं लगे..? उसके परिवार में इस बर्ताव के क्या परिणाम होंगे क्योंं नही सोचा गया एक भी बार...?"
"माफी बहन, माफी..."
"दिल ही टूट गए हम दोनों के भाई...!! देख लो क्या तुम्हारी दौलत उस टूटे दिल को जोड़ सकती है क्या..?"
"मत बोल ऐसा..दर्द होता है..."
"भाई अगर भाभी के मायके के लोग आपसे ऐसा बर्ताव करेंगे तो आपको क्या फील होगा..?"
"जो हुवा बेहद बुरा हुवा पूजा, पर मैं तो छोटा था न, कुछ न कर सका..."
"भाई, रिश्ता नाजुक डोर से बंधा होता है, पैसे की अकड़ रिश्तो की रेशम की डोर को तोड़ जाती है।पैसा गरीबी को खरीदने की कोई कोशिश नहींं छोड़ता, मैं भी जानती हूं।"
"ऐसा मत बोल..."
"सच कड़वा होता है भाई, पर आज तुमने बोला सो बोल रही हूं, मैं तो साईंं बाबा की बेटी हुंं। मेरी भक्ति ने मुझे खुद्दार बना दिया है। मेरी भक्ति, खुदारी को दुनिया की कोई ताकत नहींं खरीद सकती भाई...!"
"सच कहती है तू..तू आती भी क्योंं नहींं..?"
"तुम्हारे हर सवाल का जवाब मैंंने दिया है भाई। पर दुख ये है मेरा की, मायके के इस बर्ताव से आपकी बेटी को पति से, ससुराल से किसी भी तरह की तकलीफ होती होगी ये विचार भी नहींं आया आप लोगो के मन मे..? मेरा मन दुखता होगा तो किस कांधे पर सर रखती होगी मैं..? क्योंं नही सोचा ये कभी..?क्योंं..क्योंं भाई...?"
"पूजा माफी बहना ,माफ कर दो.."
"ऐसी कई अनुभूतियां ली मैंंने भाई, जब मैं पूरी की पूरी अकेली थी। अनाथ थी...!! तभी से मैंने खुद को समझा दिया बच्चा तेरा कोई नहींं है, तू अनाथ है। केवल साईंंबाबा ही तेरा सबकुछ है...!!तभी से मेरा दर्द कम हो गया...! कोई भी चाह, अपेक्षा, उम्मीद न रही किसी से भी। अपने पति से भी नहींं...मुझे आप लोगो की दौलत, पति का पैसा भी नहींं चाहिए भाई, मैं तो सिर्फ अपना मूल्य चाहती हुंं!"
"पूजा हम है न..."
"हं...हो न...मैने कब कहा नहींं हो..."
"फिर तुम....."
"हो भाई, तुम सब हो रहोगे भी, मैन सदा तुम सबके लिए दुवा की है पर मेरा सहारा, जरूरत नहींं हो भाई...!"
"...."
"दीपक भाई, सब खुश रहो। अपना माँँ-बाबा का ख्याल रखना। मुझे सिर्फ मेरा मूल्य, मेरा सम्मान चाहिए, बाकी कुछ नहींं। वक्त मिला तो कभी बात कर लिया करो ।god bless you... all...!

************

- वृषाली सानप काले

Comments

Popular posts from this blog

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं

संस्कृत भाषा के शब्द भंडार से सम्बंधित बातें

इम्तिहान