समेट ले...सिमट ले...

अब भी क्या बाकी है सिमटना..??
कितना सिमटे.
कितना समेटले...??

कायनात की उल्फत
तथा ताकत की भी लौ..
शायद भस्म ही नही तो
राख के कण कण से भी
अस्तित्व विहीन हो गयी है...!!

समंदर की सुनामी तथा
नदियों के बाढ़ का जल भी
जब सूखकर निशान विहीन
सा अवसाद ढूंढता रहे ..
पर हासिल कुछ न हो...!!

तब भी जब कोई कहे..
सिमट लो ...
समेट लो...!!
तो मन का लाव्हा उद्विग्नता
से आक्रोश ही करे...
रेत पे निशान भी नही छोड़े
हमने सहन शील सिमट के...
कदमो के...!!
वाह रे जमाने...
फिर भी कहे...सिमट ले..समेट ले...!!

- वृषाली सानप काले

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