मौन

   मौन मनुष्य जीवन की ताकत है। परन्तु इंसान उस शक्ति का इश्तेमाल सही पद्धति से न करने के कारण आज पीड़ा एवं त्रासदी युक्त जीवन जी रहा है।
मौन मतलब अंतर्मुखी होना। अंतर्मुखी बन जीवन को जीना।अंतर्मुखी होना अर्थात चिंतन करना स्वयम की  हर कृति व विचार का चिंतन करना। अपनी आत्मया तथा उसकी सकारात्मकता के प्रति एकाग्र होकर रहना ही अन्तर्मुखी बनना है ।आत्म अभिमानी बनकर उस शक्ति के मूल के अंत मे खो जाना यही अंतर्मुखता है।
अंतर्मुखी लोग सदा सुखी होते है ,क्योँकि वो जगत के विकारों को चिंतन का विषय नही बनाते। जो स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा की गति ,शक्ति व कृपा की याद में मशगूल रहते हैं ,जिस कारण से सदा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करते है,उसका आनंद बार बार संभालकर रखते है।
अंतर्मुखी होकर रहना इतना आसान भी नही तथा कठिन भी नही ,तथापि उसकी उचित जानकारी का होना आवश्यक है।अंतर्मुखी होना याने व्यर्थ के विचारों को अपने मन व मष्तिष्क में बिल्कुल स्थान न देना।जो विचार नकारात्मकता व निरर्थकता की तरफ ले जाये उनसे बचना।अंतर्मुखी अर्थात किसी भी बिकट स्थिति में भी बुद्धि बाहर की ओर ना भटके किंतु  सदा आत्म-चिंतन,आत्मया की उन्नति , परमात्म-चिंतन तथा पारमार्थिक स्थिति में लगी रहे।
अंतर्मुखी बनना याने यह नहीं की बस मुख का मौन स्वीकारना परन्तु अंतरतम में विचलित स्थिति को रखना।ऊपर से बर्फ परन्तु अंतर से अग्नि हो तो उसे मौन नही कहते।मौन में समस्त विघातक,व्यर्थ व नकारात्मक विचार नही चले ,वे मौन रहे। अंतर्मुखी होना व मौन रखना  माना व्यर्थ संकल्पों एवम नकारात्मक  संकल्पों को मौन देना। अपने मन की व्यर्थ संकल्पों की शक्ति को परिवर्तित करके उन्हें समर्थ संकल्पों की ओर ले जाना,व्यर्थ के दुष्परिणामो से परिचित कराना । आत्म-कल्याणकारी और विश्व-कल्याणकारी संकल्पों की ओर ले जाकर उनसे सकारात्मक कृति करवाना यही सच्ची अवस्था मौन की है।
 मौन के द्वारा अनेक क्रियात्मक  शक्तियां विश्व को चला रही है।प्रकृति को ही देखे तो सूरज,धरती,आसमान,पेड़,पर्बत, नदी ,सागर सब अत्यंत मौन रूप से लगातार बिना थके बिना रुके अपना कार्य सफलता के साथ कर ही रहे है।अर्थात मौन हमारी कार्यशक्ति को बढ़ाता है,मौन हमारी ऊर्जा की गति देता है, मौन हमे सफलता की सीढ़ियों तक ले जाता है, मौन विनाश व विध्वंसक विचारों को आने नही देता, मौन विकारों से बचाता है। जिस निराकार शक्ति द्वारा इस समस्त सृष्टि का संचालन व हिफाजत हो रही है,वो निराकार शक्ति भी तो मौन के द्वारा ही कार्य करती है।इतना ही नही उसका अस्तित्व सदैव ध्यान में भी ला डरती हसि। उस शक्ति का ही यो नाम निराकार परमपिता परमात्मा है।उस परमपिता के साथ बुद्धियोग रख गुणवान बनना यही मौन का प्रमुख काम है । इसलिए हमारी अन्तर्मुखता हमारी शक्ति भी है तथा सफलता भी।
   मौन से हम परिपकव इंसान एवं सफल आत्मिक  जीवन की अनुभूति प्राप्त करते है।मौन सफल जीवन की अमोल कुंजी है।
परमात्मिक शकयी के प्रेम की अनुभूति को प्राप्त करना है तो मौन का गहना पहनना ही पड़ेगा।

- वृषाली सानप काले

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