क्या है अध्यात्म...(भाग-9) सांसारिक जीवन-योगी व योग

 सांसारिक जीवन मे जीवन गुजारना वैसे तो वास्तव में अत्यंत कठिन है,परन्तु असम्भव नही..!!जिसका प्रज्ज्वलित उदाहरण है हमारे सामने-- संत तुकाराम...!! वास्तव में योगी समाज मे रहेगा तभी समाज का परिवर्तन होगा। समाज से परे रहेगा तो सिर्फ योगी का परिवर्तन होगा। परन्तु समाज मे रहकर योगी के योगित्व की हिफाजत के लिए पहले योगी को समाज की तमाम इम्तहानों को पार करना होगा अर्थात केक समस्याओं का मुकाबला करना होगा, तपना होगा योग की अग्नि में, ज्वालामुखी योग की शक्ति बढ़ानी होगी, केवल तभी योगी समाज मे रहकर योगित्व को निभाये समाज का कल्याण की शुभ भावना, संकल्प, सेवा, योग एवं दुवांंये देने योग्य बन सकता है...!!ईश्वर का बन्दा बनकर ईश्वर की इस रचना के सेवा योग्य बन सकता है..!!

  समाज तुरन्त नहींं बदलता। समाज की कड़वी, निष्ठुर व्यवहारिकता, निर्दयी वृत्ति, स्वार्थ परायणता एवं अमानवीयता को बदलना तो है, लेकिन पहले ये सब योगी पर ही आक्रमण करेंगे। उसवक्त सदैव ईश्वरिय शक्ति से जुड़े रहो।

सदा निश्चिन्त रहो। आप हर बात में हाँ-जी, हाँ-जी करते रहो। स्वयं भी हल्के रहो और सर्व को हल्का रखो। किसी भी हालत में ज्ञान व योग की स्थिति विचलित नहींं होनी चाहिए। ये सब पेपर है, समझ ताकत को बढ़ाना है, क्योंकि योगी ईश्वर का बन्दा है। 

भले ही नापसन्द हो फिर भी, किसी भी बात को जल्दी मना मत करो, उस समय मुस्कुरा कर उस बात को हल्का कर दो। फिर अपने इसी ऊँच स्वमान में स्थित हो सपनी समेटने की एवम समझाने की प्रेम की शक्ति को बढ़ाकर उन्हें अपने दिल की बात कह दो। कितनी भी कठोर लगे वो बात परन्तु सुननेवाला इनकार भी नहींं करेगा तथा स्विकार भी नहींं करेगा, परन्तु शांति से उसपर विचार करेगा फिर कृति करेगा।

लेकिन फिर भी बावजूद इसके यदि सामनेवाला फिर भी अपनी बात ही ऊपर रखें तो उनके अनुसार चलो परन्तु वातावरण को भारी मत करना, ना ही स्वयं की सोच से और ना ही उस आत्मा की सोच से...बल्कि उसकी इच्छा से चलते वक्त भी उसमें शुभ संकल्पों का दान दो एवं परिवर्तन की धारा को मजबूत बना दो। बस स्वयं की बात न सुनी इस कारण निकले संकल्प को भी तेरा-तेरा कर दो और उस आत्मा को भी उसकी बात सुनी इस कारण के अहंभाव को भी नष्ट कर दो।

फिर जल्दी ही वह आत्मा भी परिवर्तन हो जायेगी।जिससे अन्य आत्माओं पर भी आपके विचारों का(वायब्रेशन्स) का प्रभाव पड़ता जाएगा। जिन्हें परिवर्तन करने के लिए आप निमित्त बने हो।

 इसलिए स्वयं के स्वभाव-संस्कार को बिल्कुल सहज बना लो। परिवर्तन करना ही मेरा कार्य है, जिस लिए ईश्वर अपने साथ है। ये जो भी हुआ वो मैं ने नहींं तो ईश्वर ने किया है।

जितनी-जितनी आपके अन्दर स्व परिवर्तन की शक्ति आती जायेगी, उतनी ही आपकी शुभ भावना, शुभ कामना शुभ संकल्प, शुभ दुवांंऐ उन आत्माओं को परिवर्तन करती ही रहेगी। बस जरूरी है कि योगी स्वयं पर ध्यान रखे पुरुन रूप से खुद को किसी भी बात में भारी जड़ नहींं होने दे।

    योगी आत्मा को समाज मे परिचितों के बीच रहते वक्त केवल वर्तमान में ही रहना होगा अर्थात् ना ही भुतकाल का सोचोगे और ना ही भविष्य का, बल्कि वर्तमान में रह हर संकल्प को परमात्मा को समर्पण कर हल्के और निश्चिन्त रहेंंगे तो जल्दी ही समाज के समस्तो में, सभी में एक बड़ा परिवर्तन अनुभव होगा। योगी को सदैव हर आत्मा फिर वो क्रूर, पापी, निष्ठुर, स्वार्थी कैसी भी हो उन सर्व आत्माओं के प्रति रहम और कल्याण की भावना रखनी होगी।

  परमात्मा सदैव अपने ऐसे योगी बच्चोंं से कहते है कि, देखो बच्चे, आपके परिवर्तन से ही आपके संपर्क की वे सभी आत्मायें परिवर्तित होगी। इससे ही आपके घर का वातावरण भी पूर्णता परिवर्तित होगा, और फिर जल्द ही तीव्र गति से पूर्ण रूप से आपका घर  शक्ति स्थल(मंदिर जैसा) बनेगा...। 

इसलिए तुम्हे हर बात में  सकारात्मक रहना है। जब आप बच्चों पर परमात्मा बाप की नज़र है और आप बच्चे भी हर कदम परमात्मा की श्रीमत प्रमाण उठाते हो, तब तो हर बात में कल्याण ही कल्याण होगा ये त्रिकालबाधित चिरसत्य है...!!

परमात्मा सदैव अपने बच्चों को आप समान बनाना चाहता है तो आत्माओं को भी अपना पूर्ण सहयोग देना पड़ेगा..!! बस हर संकल्प को करते वक्त, कर्म करते वक्त तेरा-तेरा करते चलना है निश्चय रखना है और निश्चिन्त रहना है। फिर जल्द ही देखते ही देखते मंज़िल पर पहुँच जाओगे। योग में सदैव हर आत्मा को  धनुर्धर अर्जुन के समान एकाग्रता रखनी चाहिए...!!

योग--
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 जैसे बताते है कि बाण चलाते हुए आस पास अनेकों बाते दिखते हुए भी धनुर्धर अर्जुन का ध्यान मछली की आंखों की छोटी पुतलियों पर था यह यादगार हम राजयोगी आत्माओं का ही है।

  इसलिए हम आत्माओं को योग के समय परमधाम में एक बिंदुरूप परमात्मा और मैं आत्मा इस मधुर मिलन के दृश्य के सिवाय अन्य किसी भी बातों को मन बुद्धि द्वारा नही देखना है।

योग के शुरुवात में हम मन, बुद्धि द्वारा यह भले देखे की मैं आत्मा देह से निकलकर स्थूलवतन और सूक्ष्मवतन को पार करके परमधाम जा रही हूं परंतु एक बार परमधाम में पहुंचने के बाद...यह दृश्य देखने की भी जरूरत नहींं है कि मैं परमधाम में हु और नीचे सूक्ष्मवतन है और उसके भी नीचे स्थूलवतन है। परमधाम में होते समय सूक्ष्मवतन और स्थूलवतन को नहींं देखना है। योग के बाद मनसा सेवा करते समय भले इसको देख सकते है।रूहानी सेवा से भी इसे अनुभूत कर सकते है।

जितना हम इन विस्तार के अनंत पसारे को भूलेंगे और पूर्णतः अपने मन और बुद्धि को बिंदुरूप शिव परमात्मा पिता पर एकाग्र करेंगे उतना ही हमें योग में परमपिता परमात्मा द्वारा शक्तिशाली विकर्म विनाश के करंट की अनुभूति होगी। जो हमे शक्तिशाली आत्मा बना देती है। इसलिए हर दिन हर वक्त योग की अग्नि को जलाए रखना है तथा बढाते रहना है।

- वृषाली सानप काले

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