क्या है अध्यात्म..? (भाग 7) राजयोग

  राजयोग याने अपने समस्त इंद्रियों को वश में करना। अर्थात आज जिन इंद्रियों का मनुष्य गुलाम बन चुका है, उनपर राज्य करना याने राजयोग।राजयोग इंद्रियों पर अंकुश रखना सिखाता है।इंद्रियों निर्मित व प्राप्त समस्त पीड़ित जीवन को सुधारता है। राजयोग आसुरी गुणों को नष्ट करता है। राजयोग सात्विक शक्तियों को बढ़ाता है। राजयोग कुकर्मो से लड़ना सिखाता है। मौन की समस्त शक्तियो को उजागर करता है। मनुष्य की खोई हुई सुंदर प्रवृत्तियों को विकसित करता है।राजयोग राजयोग 'ढाई आखर प्रेम' की शक्ति को बढ़ाता है।राजयोग प्रेम से विश्व को जीतने की ताकत दिलाता है। राजयोग इंसान को देवता बनाता है।राजयोग इंसान की रूह को  इंसान की रूह से मिलाता है।राजयोग रूहानी रिश्ते जोड़ता है।राजयोग रूहानी ताकत का दर्शन कराता है।राजयोग रूह के द्वारा रूह की रूहानी सेवा, रूहानी मुक्ति, रूहानी प्रेम, रूहानी माफी की शक्ति सिखाता है। सिखाता भी है व उपयोग में ले आता है। राजयोग रूहों के द्वारा रूहों को शांति दिलाकर शांति का राज्य प्रस्थापित करता है। राजयोग सुख, समाधान, शांति, प्रेम, आनंद व सत्य इन शाश्वत मूल्यों की स्थापना करता है, जो आत्मा की शक्ति व संस्कार है। राजयोग इन सबसे महत्वपूर्ण बात कि जो इंसान आजीवन ईश्वर को ढूंढ ढूंढ कर परेशान हो चुका है, उस इंसान को ईश्वर से मिलाता है...!! राजयोग रूह को ईश्वर से अर्थात आत्मा को परमात्मा से मिलाता है।

 आत्मा व परमात्मा का मिलन ही वास्तव में सच्चा "राजयोग "है।

     राजयोग अज्ञानता को नष्ट करने का ब्रह्मास्त्र है। राजयोग के अभ्यास के द्वारा ही सकारात्मक ऊर्जा से कर्मों के परिणाम अनुकूल बनते है। राजयोग ही वास्तव में इस धरती पर सात्विक सतयुगी दुनिया का प्रवेश द्वार है। राजयोग ज्ञान का ऐसा दर्पण है जिसमें तक़दीर की तस्वीर स्पष्ट दिखाई देती है। राजयोग निकृष्ठ स्तर के अस्तित्व को भी हीरे समान चमकदार बना देता है। राजयोग के अभ्यास से परचिन्तन की प्रवृत्ति का स्वचिंतन में परिवर्तन होता है, तथा परिस्थितियों को समझने, परखने और परिवर्तन करने की शक्ति का विकास होता है।

राजयोग की पढ़ाई ही इस जहरीली दुनिया में ख़ुशी और शान्ति के निर्माण की एकमात्र साधन है।राजयोग में ही ज्ञान और विज्ञान दोनों है। राजयोग असम्भावनाओं को सफलता की सम्भावना में बदलने वाला विज्ञान है, इतना ही नहींं तो इस अंधकार के पश्चात आने वाले नवयुग के लिए संस्कार परिवर्तन करने की अनूठी चाबी का योग है। राजयोग द्वारा अलौकिक आत्मानुभूति करना ही जीवन की प्रथम और अन्तिम पाठशाला है।राजयोग आत्मा को सर्व प्रकार के मानसिक बन्धनों और भय से मुक्त करके आत्म निर्भर एवं अभय बनाता है।

राजयोग जीवन की सर्व समस्याओं का रचनात्मक समाधान देता है। अपने सारे जीवन मे दिन की समस्त बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार ‘मैं’ शब्द का प्रयोग करता है। परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन ‘मैं’ और ‘मेरा’ शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि ‘मैं’ कहने वाली इस अविभाज्य  सत्ता का स्वरूप क्या है, अर्थात यह ‘मैं’ शब्द जिस वस्तु का सूचक है, वह क्या है ? जिसका परिचय क्या है ..?? जिसकी पहचान किससे है? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजें तो बनाई है, जिससे विश्व की अनेक पहेलियों का उत्तर भी तो प्राप्त किया है। इससे भी परे वह अन्य अनेक जटिल समस्याओं का हल ढूंढने में भी सदैव क्रियाशील रहा है, परन्तु बावजूद इसके वह इस अस्तित्व के बारे में पूर्णता अन्योंन है। यह ‘मैं' जो जीवन का मनुष्य का अभिन्न अंग है आखिर वो  कौन है..??इस कड़वे  सत्य को वह नहीं जानता अर्थात वह वास्तव में स्वयं को नहीं पहचानता। आज किसी भी मनुष्य से पूछा जाये कि - “आप कौन है ?” तो वह झट से अपने शरीर का नाम बताता है अथवा जो धंधा करता है उसका नाम बताता है।

- वृषाली सानप काले

Comments

Popular posts from this blog

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं

संस्कृत भाषा के शब्द भंडार से सम्बंधित बातें

इम्तिहान