क्या है अध्यात्म..?? (भाग - 6)

आत्मा-राजयोग के लिए पात्रता तथा कर्म, आहार का शाश्वत ज्ञान
*********************
   मनुष्य ने सदैव अपने स्वार्थ की दृष्टि से ज्ञान को मरोड़ा है, जब जैसे हो सके उसे बदल दिया है।परंतु जो शाश्वत होता है उसे कोई भी बदल नही  सकता। ईंश्वर, ज्ञान, सत्य, आनंद, प्रेम, विश्वास, जन्म एवं मृत्यु ये सभी चिरंतन एवं  सत्य ज्ञान है।

      धर्म अर्थात वह सत्य ज्ञान जिसे धारण किया जाए। वह कृत्य जिसका अनुकरण धारणा के द्वारा संस्कारित हो जाये। धर्म जिसका सार, उद्दीस्ट केवल मनुष्यता है।

माँँ का बेटे के प्रति कर्तव्य याने उसका धर्म--मातृ धर्म, बाप का बेटे के प्रति कर्तव्य याने उसका धर्म--पितृ धर्म, बच्चो का माँँ--बाप के प्रति कर्तव्य याने उनका धर्म--पुत्र धर्म, अध्यापको का धर्म--गुरुधर्म, छात्रों का कर्तव्य याने उनका धर्म--छात्र धर्म, राज नेताओ का जनता के प्रति कर्तव्य याने उनका धर्म--राजधर्म, चिंतक का चिंतन के प्रति कर्तव्य याने उसका धर्म--चिंतक धर्म, वक्ता का श्रोताओं के प्रति कर्तव्य याने उनका धर्म--वक्ता धर्म...!! आदि सभी सच्चे धर्म है।

  परंतु अज्ञान वश जनता को जिन जिन महान आत्माओं ने ये ज्ञान देने की कोशिश की जनता ने उन ज्ञान देने वाले लोगोंं ने जिस जाती या भाषा या प्रांत में ये ज्ञान दिया उनके ही नाम से एक एक अलग धर्म स्थापन कर डाले...!! मनुष्य ज्ञान सीखता है, मनुष्य ज्ञान निर्माता नहींं है। जो भी ज्ञान है वह स्वयं सृष्टि तथा ईंश्वर निर्मित है। मनुष्य स्वयं कहाँ कुछ निर्माण कर पाया है..?? आज जो भी कुछ विज्ञान के शोध है, वो शोध मनुष्य ने लगाए है.. बस लगाए है.. निर्माण नही किया है।दूध, तेल, डिझेल, पेट्रोल, सीमेंट, लोहा, सोना,......?? सब के सब सृष्टी का ही है। मनुष्य ने सिर्फ उनका उपयोग करने का तरीका ढूंढा है। है ना...??

तो फिर जो चीज हमने खुद निर्माण नही की उसपर गर्व करने का हमे क्या अधिकार है...??हमारी जात, धर्म, प्रांत, भाषा, रंग, रूप, वर्ण, माँँ, बाप, लिंग आदि कोई भी बात हमने खुद निर्माण नहींं की यहां तक कि हमने खुद उनका चुनाव भी तो नही किया है...!! जो हमे केवल जन्म से प्राप्त हुवा है, तथा जन्म भी हमे माँँ-बाप ने दिया है।इसलिए हमें इन बातों को अधिक अहमियत नहींं देनी चाहिए। परन्तु वास्तविक जीवन मेंं देखे तो ये जीवन के अविभाज्य अंग बन चुके है।

आज मनुष्य उन मनुष्योंं को ईंश्वर स्वरूप दे रहे है, जो मनुष्य उनके कर्म के द्वारा महात्मा बनते है, दिव्यात्मा बनते है।

    विचारणीय बात यह है की, क्या मनुष्य ईंश्वर बन सकता  है....?? नहींं...!! क्योंकि ईंश्वर जैसा अतुलनीय, वैश्विक कार्य करने की योग्यता मनुष्य में नहींं है। मनुष्य है तो उसे देह है। जिसे देह है उसे मृत्यु है। जिसे मृत्यु है उसे जन्म का फेरा है। जिसे जन्म--मृत्यु का फेरा है, उसे कर्म की गति है। जिसे कर्म की गति है ,उसे प्रारब्ध की नीति है...!! ये सब बातें ईंश्वर इस संकल्पेना में  नही है। ईंश्वर इस शक्ति स्वरूप का न कोई आकार है, ना ही कोई रंग, रूप, जात, धर्म, पंथ, वर्ण, स्वरूप है।ईंश्वर को न जन्म है न मृत्यु है। जो किसी भी अस्त्र,शस्त्र, विधि,विधान से नष्ट नही होता।

        मनुष्य केवल कर्म से खुद को सिध्द कर सकता है। कर्म ही मनुष्य की ताकत है तथा कर्म के द्वारा ही मनुष्य अपने प्रारब्ध का निर्माण करता है। प्राचीन समय मे इसीलिए आश्रम व्यवस्था थी।आश्रम पद्धतियां कर्म के विभाजन के लिए थी।इंसानों ने उन्हें स्वार्थ की दृष्टि से जातियों में वर्गीकृत कर दिया।आज वही जातियां इंसानों के नफरत, द्वेष, एवं घृणा तथा मारकाट की वजह बन चुकी है। जैसा देखे तो ब्राम्हण ये कोई जाति नहींं है। ब्राम्हण शब्द का अर्थ है जो व्यक्ति पूरे ब्रम्हांड के ज्ञान से, सृष्टि चक्र के ज्ञान से परिचित, कर्म की गुह्यतम गतियों से पूर्णता परिचित हो उन्हें ही ब्राम्हण कहलाने का हक है। ब्राम्हण कोई व्यवस्था नहींं है या जाति प्रवर्ग नहींं है। ऐसे ही आध्यात्मिक ज्ञान से जुड़े लोगों को ब्राम्हण कहते है। हम जिन्हें ब्राम्हण कहते है वो एक जाति है। जो पूर्णता कर्मकांड से प्रभावित है।

  मनुष्य का पेहराव, आचरण, उसका परिचय दिलाते है। उसका खान पान भी उसके संस्कार सिद्ध करते है। बहोत सारे लोग बहोत सारी बाते न् खाने की बात करते है, परन्तु इसका स्पस्टीकरण नहींं दे पाते या नहींं जानते। कुछ ऐसी ही बाते की जो मनुष्य के वर्तन व स्वभाव तथा जीवन वृत्ती का स्पस्टीकरण खान पान से देते है।

      जैसा कि प्याज एवं लहसुन। प्याज और लहसुन के बिना आपको खाना बेस्वाद लगता होगा, लेकिन कुछेक लोग इससे दूरी बनाकर चलते हैं। आध्यत्म के मार्ग पर चल रहे तथा राजयोग के अभ्यासी जो ब्रम्हांड के आदी-मध्य-अंत से भली भाँति परिचित होते है, जो सखोलता एवं गहराई से आध्यात्मिक ज्ञान से जुड़े अभ्यासी लोग होते है, उन्हें ब्राम्हण कहते है। वे ब्राह्मण प्याज और लहसुन से परहेज क्यों करते हैं, क्या आपके दिमाग में भी ये सवाल कभी कौंधा है। लोग इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हैं, लेकिन कुछेक इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी बताते हैं।  यहां आपको उन वजहों की जानकारी दे रहे हैं जिनसे ज्ञात होगा आध्यात्म साधक प्याज और लहसुन से दूरी बनाते हैं... !!

शास्त्रों में आयुर्वेद का अपना एक अलग अस्तित्व एवं महत्व है। सभी मेंं श्रेष्ठ शरीर शास्त्र का परिचायक आयुर्वेद है। जिसके अनुसार अन्न की तीन कोटिया, स्थितियां होती है। जो तीन स्थितियां अन्न की होती है, वही तीन स्थितियां मनुष्य स्वभाव की भी होती है। मनुष्य प्रवृत्ति की भी होती है।

    आयुर्वेद में खाद्य पदार्थों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है -
1. सात्विक
2. राजसिक 
3. तामसिक

इन तीनो स्थितियों के आधार पर इन्हें प्रवृत्ति को मात्र ऐसे भी बांट सकते हैं...!!

सात्विक: 
शांति, संयम, पवित्रता और मन की शांति जैसे गुण सात्त्विक होते है।

गुणराजसिक: 
जुनून और खुशी जैसे गुण राजसिक होते है।

गुणतामसिक: क्रोध, जुनून, अहंकार और विनाश जैसे गुण तामसिक होते है।

प्याज़ और लहसुन तथा अन्य ऐलीएशस (लशुनी) पौधों को राजसिक और तामसिक रूप में वर्गीकृत किया गया है। जिसका मतलब है कि ये जुनून और अज्ञानता में वृद्धि करते हैं। 

(अहिंसा ) हिंदू धर्म में, हत्या (रोगाणुओं की भी) निषिद्ध है। जबकि जमीन के नीचे उगने वाले भोजन में समुचित सफाई की जरूरत होती है, जो सूक्ष्मजीवों की मौत का कारण बनता है। 
अतः ये मान्यता भी प्याज़ और लहसुन को आध्यत्म साधको के लिये निषेध बनाती है, लेकिन तब सवाल आलू, मोल्ली और गाजर पर उठता है, मतलब तो क्या ये भी नही खाने चाहिए..??

कुछ लोगों का ये भी कहना है कि मांस, प्याज और लहसुन का अधिक मात्रा में सेवन व्यवहार में बदलाव का कारण बन जाता है। अर्थात इनका अधिक सेवन मनुष्य को क्रोधी बना देता है।कोपिस्ट व्यक्ति का अपने इंद्रियों पर कोई भी नियंत्रण नही रहता। वह कोई भी हिंसक कार्य तक कर सकता है।

            शास्त्र के अनुसार लहसुन, प्याज और मशरूम ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध हैं, क्योंकि आमतौर पर ये अशुद्धता बढ़ाते हैं और अशुद्ध खाद्य की श्रेणी में आते हैं। ब्राह्मणों को पवित्रता बनाए रखने की जरूरत होती है, क्योंकि वे पूजनीय कर्म के प्रणेता होते है, तथा  प्रकृति में, प्रवृत्ति में, विचारो में भी सात्विक (शुद्ध) होते हैं। 

   सनातन धर्म के वेद शास्त्रों के अनुसार प्याज और लहसुन जैसी सब्जियां प्रकृति प्रदत्त भावनाओं में सबसे निचले दर्जे की भावनाओं जैसे जुनून, उत्तेजना और अज्ञानता को बढ़ावा देती हैं।काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, एवम वाम मार्ग को उत्तेजित करती है, जिस कारण अध्यात्म के मार्ग पर चलने में बाधा उत्पन्न होती हैं और व्यक्ति की चेतना प्रभावित, तथा असन्तुलित भी हो सकती  है। इस कारण इनका सेवन नहीं करना चाहिए । 

    फिर भी इससे कुछ अन्य मान्यताएं भी हम देखते है। इन बातों का अब कम महत्व है, क्योंकि शहरी जीवन में तो जाति व्यवस्था विलुप्त होने के कगार पर है और बेहद कम लोग ही इन नियमों का पालन करते हैं। आज के दौर के अधिकांश लोग, खासतौर पर युवा पीढ़ी इसे अंधविश्वास से जोड़ कर देखती है या यह वर्तमान जीवन शैली के कारण इनका पालन नहीं कर सकती है।
लेकिन इन सबके होते हुए भी आध्यात्मिक साधना के अनुसार भी तथा आयुर्वेद के अनुसार साधू, संन्यासी,  ब्रह्मचारी और सत्मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को लहसुन, प्याज सेवन नहींं करना है।

    तो सारांश में यही सत्य है कि अगर मनुष्य को अपने कर्म के द्वारा अगर दिव्यता एवम महानता का परिचायक बन स्वयम का भाग्य श्रेष्ठ बनाना है तो प्याज, लहसुन जैसी चीजों को वर्ज्य कर अपना जीवन मान सुदृढ़ बनाने का प्रयास करना चाहिए।

   यही सत्य एवम सरस ज्ञान है। इस तरह से आत्मा जब शुद्ध व पवित्र बनती है, तब जाकर वह योग आसानी से लगाने व ईश्वर से स्नेह तथा शक्ति पाने योग्य बन जाती है। अर्थात राजयोग सीखने योग्य छात्र बन जाती है।

   तो जानते है आखिर क्या है राजयोग...?

  -  वृषाली सांनप काळे

Comments

Popular posts from this blog

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं

संस्कृत भाषा के शब्द भंडार से सम्बंधित बातें

इम्तिहान