क्या है अध्यात्म..?? आत्मा (योग (राजयोग) भाग--5

 अपने जन्म जन्म के संस्कार से ही वह सदैव कर्म करती है। इन कर्मो से ही मनुष्यो का जीवन चल रहा है। इन कर्मो के संस्कारों में परिवर्तन होता रहता है। वह परिवर्तन परिस्थिति, संस्कार तथा बुद्धी व ज्ञान के आधार पर होता है। मनुष्य जैसा कर्म करता है वैसा उसका धर्म होता है।

वास्तव में उसका कर्म ही उसका धर्म है। उसके क्रम के आधार से युक्त भूमिका ही उसका धर्म है।आज वास्तव में इसी भूमिका से लोग अनभिज्ञ होने की वजह से ही सृष्टि पर अराजकता तथा अशांति का माहौल बढ़ गया है।

मुझे जो चाहे मैं करु ये प्रवृत्ति ही संस्कार तथा धर्म मे परिणत हो चुकी है। स्वतंत्रता का अर्थ हर एक नए स्वार्थानुसार स्वैराचार लगा लिया है। इसी के समान कई सारे चिरन्तन एवं शाश्वत शब्दो का अर्थ मनुष्य ने नीति को छोड़कर स्वमतानुसार स्वीकार लिया है। यही तो वो गफलत है जिसने मनुष्य को अंधकार की गहरी खाई में सदियो से धकेल दिया है।

   जब कोई भी मनुष्य आत्मा अपना धर्म अर्थात कर्म, संस्कार, गुण को परिवर्तित कर लेती है तो उसे विकृत या विकारी कहते हैं। अतः विकार याने परिवर्तन। धर्म, स्वरूप या गुण परिवर्तन का नाम ही विकार है। आत्मा को विकारी तब कहा जाता है जब आत्मा अपने परिचित स्वरुप में बदल देखती या करती है। आज की स्थिति में आत्मा विकारी है अर्थात उसने अपने दिव्यतम गुणों को छोड़ा हुआ है। वह अपने निश्चय शांति धर्म को त्याग कर और संपूर्ण अहिंसा, संतोष, प्रेम, दया, निर्विकार, अडोल, धैर्य आदि दिव्य गुणों को छोड़ कर केवल देह के बंधन में स्थित होकर निकृष्ठ, स्वार्थ, अहंकारी, अशांत और आसुरी लक्षणों वाली हो जाती है।                   

जैसे शीतल जल अग्नि से मिलकर अपनी शीतलता रूपी धर्म का त्याग कर विधर्मी अर्थात गर्म हो जाता है, ठीक उसी प्रकार शांति स्वरूप आत्मा भी मायारूपी विकारयुक्त जड़ प्रकृति के प्रभाव में जीकर संघर्ष करती हुई तड़फड़ाते हुए अपनी आत्मनिष्ठा को और अपनी शांति को खोकर कार्य करके विधर्मी और विपरीत गुणों वाली हो जाती है। आत्मा का मूल धर्म विस्मृत हो जाता है। हर शक्ति अपने स्वधर्म में स्थित होकर कार्य करे तो वह कार्य विकसनशील सिद्ध होता है।स्वधर्म ही हर शक्ति की वास्तविक पहचान होती है। स्वधर्म ही सबको बहुत प्रिय लगता है, उसमें ही सुख मिलता है, क्योंकि स्वधर्म से ही शास्वत एवं चिरन्तन सत्य व सुख की उपलब्धि निहित है। अल्प काल का सुख सदैव दिशाहीन कर देता है, तथा स्व स्थिति से विलग कर देता है। स्वधर्म में टिकने से ही सुख की प्राप्ति होती है। उन शास्वत लक्षणों को ही स्वधर्म कहते है, अतः स्वभाव में ही सब मनुष्य आत्मा की सुख और शांति प्राप्त करना चाहती है।  
                      
      परन्तु इस सत्य का ज्ञान ना होने के कारण आत्मा भटक जाती है। गुण व शक्ति को कैसे आत्मा में पुनः स्थित होना है तथा विकारों  को कैसे समाप्त किया जा सकता है, यह कोई नहीं जानता है। इस सत्य ज्ञान को प्राप्त करने के लिए ही अध्यात्म जरूरी है। जब तक मन को आत्मा को देह, व्यक्तियों और विश्व के आकर्षण के प्रभाव से नहीं निकाला जाए तब तक मनुष्य निर्विकारी तथा स्वधर्म में स्थित नहीं हो सकता। मतलब हो ही नहींं सकता।

   आत्मा के पूरे प्रवास के जो चार प्रमुख सोपान है, उन्हें योग कहते है। योग अर्थात जो मूल स्वरूप है जिस भी अस्तित्व रूपी शक्ति का उसे उसी स्वरूप में युक्त कर लेना व प्राप्त करना। योग अर्थात ज्ञान की शुद्ध रूप में प्राप्ति। योग के बगैर मनुष्य जीवन अधूरा है। परन्तु कलियुग व अज्ञान के प्रभाव से मनुष्य ने योग को "योगा" का स्थान दे दिया है। योगा वह विधि है जिससे केवल शरीर की शुद्धि होती है। शरीर की तमाम विकार वृत्ति को शुद्ध करना। योग मन व आत्मा को शुद्ध करता है तथा योगा तन व केवल तन को ही शुद्ध करता है..!! इसलिए योग व योगा में जमीन आसमान का फर्क है।

   इस शुद्धिकरण की विधि की अध्यात्म में एक अत्यंत अभिन्न भूमिका है। क्योँकि जबतक मनुष्य अात्मा से शुद्ध नहींं होता तब तक वह अध्यात्म को ही नहींं जान सकता। तो फिर आत्मा व परमात्मा को जानने की बात तो कोसो दूर की बात है।

  योग के कुछ प्रमुख सोपान है --
  •  कर्म योग, 
  • भक्ति योग, 
  • ज्ञान योग व 
  • संन्यास योग

मनुष्य आत्मा कर्म योग से परिचित है। परन्तु वास्तविक कर्मयोग को छोड़कर आत्मा विकार युक्त ही कर्म करने में जीवन व्यतीत कर देती है।जिसके परिणाम स्वरूप में दुख भोगती है।

  भक्ति योग अगर भक्ति योग को "नविधा भक्ति" की समस्त सीढ़ियों के द्वारा अर्थात नव मार्ग द्वारा प्रेम व श्रद्धा से पर किया जाए तो यह एक उत्तम मार्ग है, परन्तु दुर्भाग्य से अनेक संप्रदायों ने तथा परंपरागत ब्राम्हण वर्ग ने दिखाये मार्ग अनुसार  केवल कर्मकांड तक ही भक्ति योग सीमित करके रख दिया। जिसके परिणाम स्वरूप ईश्वर व  ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग अधिक तर दुश्वर व विडंबना का विषय बन गया।

  ज्ञान योग यही सच्चा ज्ञान मार्ग है तथापि प्रस्थापित वर्ग ने शिक्षा पद्धति में आधी दैहिक व आधी भौतिक इन शाखाओं को ही समाविष्ट कर दिया है। जिनमेंं एक शाखा समस्त चराचर का अध्ययन करवा देती है, तो एक शाखा केवल जीव अर्थात मनुष्य व जीव जंतु, प्राणी तथा सजीव सृष्टि का अध्ययन करवा देती है। परन्तु ये मनुष्य जीवन जो पूर्णता जिस आत्मा के लिए जिया जाता है या जो जीती है, अर्थात कर्म करती है उसका अध्ययन जिस अध्ययन की शाख में किया जाता है उस "अध्यात्म" की शाखा को ही अध्ययन पद्धति से निकाल फेंक दिया है। जिसके परिणाम स्वरूप आज समस्त जगत का यह बीभत्स स्वरूप, नैतिक अधोगति हम देख रहे है।

   चौथा सोपान अर्थात संन्यास योग। जब ऊपर स्थित तीनो शाखाओं से व्यक्ति अर्थात आत्मा पूर्णता ज्ञानी हो जाती है, तब वह व्यवहार व जगत से विरक्त हो जाती है, तथा केवल परमात्म मिलन से अनुरक्त हो जाती है, उसे कहते है-- संन्यास योग

परन्तु प्रस्थापित समाज वर्ग ने इसे भी आडम्बरी त कर दिया है कि संन्यास याने परिवार का त्याग कर संन्यास लेना। परिवार त्याग ये तो स्वेच्छा की बात है, परन्तु जबरन केवल नियम मानकर परिवार, सम्बन्ध त्यागकर भी अगर उनकी लालसा जीवित रही तो वो त्याग कैसे होगा। त्याग अर्थात वो समस्त व्यवहार, लेनदेन, जीवन, भोग, सुख व ऐशो आराम की चीजें सामने होते हुए भी उन्हें न करने की उनके प्राप्ति की भावना का त्याग। अर्थात समस्त विकारी इच्छाओं मोह, द्वेष, घृणा युक्त भावना का त्याग, संन्यास याने सन्यास योग।

    इन चारों सोपानों के अंत मे एक सोपान है, जिसे कहते है "राजयोग"..!!राजयोग की प्राप्ति ही जीवन की सफलता है। राजयोग याने उपरोक्त सभी से परे होकर अपने सम्पूर्ण इंद्रियों पर राज करना एवं इन सभी से परे इस सृष्टि रचैता परम पिता की शास्वत सत्ता से रिश्ता जोड़े अपने अर्थात आत्मा के चारो पुरुषार्थो की प्राप्ति करना।मोक्ष को प्राप्त करना याने राजयोग...!!


- वृषाली सानप काले

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