क्या है अध्यात्म (भाग - 12) आध्यत्मिकता व व्यवहार

    वास्तव में आध्यत्मिकता की दृष्टि समाज के मन मे न होने से ही समाज आज दुरावस्था का शिकार बन चुका है। आध्यत्मिकता को भय तथा शक की दृष्टि से देखा जाता है। सन्यासी, विरक्त व दूसरे लोक का विषय माना जाता है।

   परन्तु आज के जीवन के सुखस्वरूप अवस्था की प्राप्ति का प्रमुख साधन अगर आध्यत्मिकता बन जाती है तो निर्विवाद धरती स्वर्ग बन जाती है।

  आध्यत्मिकता के गुणों को धारण कर विजयी बनाना इतना आसान भी नहींं तथा इतना कठिन भी नहींं है। बस जरूरत है सही ज्ञान व सही तरीको की। जिसके द्वारा परिवर्तन के लिए दृढ़ता की अत्यंत जरूरत है। दृढ़ता के बगैर कुछ भी सम्भव नहींं है। अडिगता ही बदलाव की ताकत रखता है।

   विचलित करनेवाली तमाम शक्तियां अडिगता के इर्दगिर्द भारी हुई है, जिनका कार्य ही विचलित एवं पराजित करना है। विकारों के कब्जे में लाना है।आध्यत्म के मार्ग को छुड़ाना है। बावजूद इसके इस मार्ग पर चलते रहना ही अडिगता है। इन सभी विचलित बातों से उभरना तो आना ही चाहिए।

  स्वभाव व पूर्व जन्म संस्कार के कारण कई बार ये होता है कि टकराव अधिक तीव्र रूप ले ही लेता है। व्यक्ति की ये मानसिकता की केवल सामनेवाला ही बदले तो परिवर्तन की प्रक्रिया बहोत समय लेती है। ऐसा कई बार होता है कि ज्ञानी व सात्विक व्यक्ति को भी सत्य की धरातल पर होते हुए भी, गलत न होते हुवे भी खामोशी स्वीकारना जरूरी है। क्योँकि आध्यत्मिकता याने अंतर की साधना, अंतर का ज्ञान, अंतर की शांति, अंतर की विशालता।

   ज्ञान के साथ साथ अंतर की शुद्धि, शांति, सद्भावना, शुभ चिंतन व साधना ही आध्यत्मिकता है। 

आत्मा को इस सत्य ज्ञान से परिचित कराके इसको धारण करके फिर ज्योत स्वरूप से जगत को आलोकित करना...!!

   इन शास्वत गुणों की प्राप्ती व फलश्रुति इतनी आसान भी नहींं है। किसी भी बात पर विचलित न होकर उसका अध्ययन कर फिर सकारात्मक वाइब्रेशन के द्वारा ही हम इच्छीत एवं सात्विक विचारधारा को दूसरों के अंतर में अर्थात सामनेवालो में निर्माण कर सकते है।

- वृषाली सानप काले

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