क्या है आध्यात्म (भाग -11) प्रारब्ध

इस मनुष्य जीवन मे प्रभु से हमें समय, श्वांस, प्रेम व संकल्पो  की अनमोल संपत्ति मिली है। संपत्ति कभी भी खुद के लिए नहींं होती। उसको हम जितना दुसरो को बाटेंगे उतनी हमारी कमाई अधिक होंगी। इसलिए हम इसका सदुपयोग करेंगे और जिन्हें हमारे समय की अधिक  आवश्यकता होगी उन्हें सदा ही देते रहेंगे। भला जरूरतमंद व्यक्ति कितना भी अज्ञानी या फिर गलत आदते व संस्कारो का आदि हो, वो हमारी भूमिका को समझने की योग्यता नहींं रख सकता। सदैव हमेंं ही समझदार बनना है व प्रेम ही प्रेम देना है...!!

  कारण की हमारे कर्म का जो भी रेकॉर्ड बन रहा है, उसमें डिलीट का कोई भी ऑप्शन नहींं है ..!!एक बार रेकॉर्ड हुआ तो बस हुआ...!! फिर उसे डिलीट करने के लिए हर एक को 84 जन्मों तक मेहनत करनी पड़ेगी, तब जाकर ये कड़ी मेहनत से ये रेकॉर्ड नष्ट होगा..!! इसीलिए रिकॉर्ड हो ही रहा है लगातार, बिना रुके तो फिर क्योंं न अच्छाई का ही रिकॉर्ड करे...!! बुराई तथा बुरे कर्मो का रेकॉर्ड क्योंं करे...!! ये रेकॉर्ड हमारा प्रारब्ध बनानेवाला है, तो इसे बड़ी सावधानी व शांति से रेकॉर्ड करना है...!! ये रेकॉर्डिंग करना केवल हमारे ही हाथ मे है, दूसरे हमारा रिकॉर्ड नहींं करते।

  हमारी जो भी आज की जिंदगी है, उसके जिम्मेदार हम ही है। हमने जो भी कुछ ऐसे कर्म इसके पहले जन्म या अतीत में किये है, उसी के परिणाम स्वरूप आज की ये प्रारब्ध बनती है।अतीत के क्रम तो बदले नहींं जा सकते परन्तु आज के वर्तमान के क्रम तो अवश्य बदले जा सकते है न...?? तो आइए अपना अपना रेकॉर्डिंग सही करे।

    अर्थात खुद ही खुद की तकदीर बनाये, कर्म की गुह्यता को जानकर...!! यही सत्य है, यही तो आध्यात्म है तथा यही तो spirituality है...!!


 -- वृषाली सानप काले

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