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राधा कौन थी..??

राधा कौन थी..?? ******************** सदियों से आज तक  सारे अंतराल को  लांघकर भी  मेरा तुम्हारा रिश्ता.. आज भी वैसा ही है...!!
फिर भी निकले  महज एक अनकहा सवाल  क्या मंजूर है तुम्हे भी व मुझे भी मेरा अस्तित्व...??
जन्म जन्म से  चला आ रहा धीमे धीमे पकता पनपता,सिमटता,उबड़ता दर्द की कारुन्यता को पहले दिल फिर दिमाग तक ताउम्र चीरता फिर भी सहता हुवा  तन्हाइयों की चादर में रोज जन्मता वही सवाल....!!
जिंदगी दर जिंदगी  बिन पलको के सोए परम्परा के दस्तावेजों  को भी दांव पर लगाता व इतिहास से  चीखकर पूछता ... बता राधा कौन थी...???
सारे शास्त्र वेद पुराण उपनिषद बस खामोश... सुनकर वे भी बोल पड़े.. बता राधा कौन थी ...??? *** - वृषाली सानप काले

मैं राधा हूँ

मैं राधा हूँ ****************** जिंदगी के शीशे पर  सदैव अनवरत दस्तक देती  ही जाती है उसके अश्को की बूंदें...
बरसाती बारिश में  वक्त की बेड़ियाँ पहन मन के भय और पीड़ा की जुगलबंदी में  घुलकर एक हो जाती है.. उसके लकीरों की बूंदे...!!
वो सब वो .. सदियों से  लिखना चाहती है पर न भाव जुटते,  न वृत्त अलंकार मात्रा के टुकड़े मिलते.
कालचक्र के बवंडर में वो तो बस चलती रही। विरहिनी न होते हुवे भी विरहिनी कहलाती रही...!!
परमात्मा के आदेश नुसार कर्मपथ पर बढ़ती रही.. एक युगभर कृष्ण के  कांधे पे सर रख  बेदाग दर्द पीड़ा को भूलती रही..पर न बही  एक भी बून्द...!!
आसमान की घटाओं से  वनों की लतिकाओ से मासूम फूलों की पंखुड़ियों से शहतूत की कोंपलों से चंपा-चमेली के पराग से मधुमालती की सुगन्धों से प्यार करते बहाती रही अपने अश्को की बूंदें ...!!
निराकार की कलम से भावना की कुलबुलाहट में  कर्मयोगिनी की आवाज में सात्विकता की सादगी से बस कहना चाहती है उसकी अव्यक्त बूंदे...!! मैं राधा हु...!!मैं राधा हूँ...!! ** - वृषाली सानप काले

क्या है आध्यत्म ..?? सृष्टिचक्र का रहस्य (भाग 16

जीवन कितना सुंदर व मनोहर है... है ना ..?? परन्तु तब जब हम सत्य से परिचित हो। अगर किसी भी बात का सत्य ज्ञान हमे नही मिलता तो उसे भी जीवन रास नही आता...!! ऐसे कई रहस्य हम नही जानते जो हमे जाग्रत व शास्वत जीवन से जोड़ देते है...!! ईश्वर, सृष्टि, जन्म, मृत्यु, कर्म आत्मा, सम्बन्ध, बन्धन ये भी कुछ ऐसे ही शास्वत मूल्य लिए हुवे है, तथापि हम अनभिज्ञ होने के कारण उन्हें समझ ही नही पाते। ऐसे ही अलौकिक सच्चाई लिए हुवे सृष्टिचक्र भी है जिसे कोई भी नही जानता। कुछ ऐसे ही सत्य व शास्वत विचार बतलाना मुझे जरूरी लग रहा है।
   सृष्टि के निर्माण, विनाश की प्रक्रिया का नियंत्रक वह है जो विश्व निर्माता है। जिसे हम परम् पिता परमात्मा कहते है। जो इस सृष्टि के अनंत आत्माओं का पिता है।इसलिए हमारा बाप है। जो समय, कर्म, न्याय, संस्कार के प्रति अत्यंत सतर्क है। जो किसी के भी गर्भ से नही निकलते व जन्म लेते।
उसकी नियमावली के अनुसार इस सृष्टि के एक संपूर्ण आवर्तन को पूरा होने के लिए 5000 वर्ष का समय लगता है। जिसे एक कल्प कहते है। ऐसे कैक कल्प आज से पहले हो चुके है। जब ऐसे एक कल्प की पूर्णता व नए कल्प की सुरुवात होन…

तुम्हारी याद

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तुम्हारी याद - Kaushalya जब बात कोई निकले, मुझे तुम याद आए जब ज़िक्र किसिका हो, मुझे तुम याद आए ना जाने हर बात पर, मुझे तुम याद आए कहीं ख्वाब कोई देखा, मुझे तुम याद आए जब सुनी कोई सरगम, मुझे तुम याद आए शमा की हर शै पर , मुझे तुम याद आए मौसम के हर रुख़ पर, मुझे तुम याद आए खुशियाँ ही खुशियाँ हो जब, मुझे तुम याद आए एहसास नया हो जब, मुझे तुम याद आए तन्हाइयों में जब मेरी, मुझे तुम याद आए ये आँख हुयी नम तो, मुझे तुम याद आए आहट सी कोई आये तो, मुझे तुम याद आए मेरी सोच की गहराई में, मुझे तुम याद आए मेरी उलझी हुई दुनिया देख, मुझे तुम याद आए । *

वस्तु नही हु मैं... (on Women's Day)

रोज की नयी सुबह की दहलीज में  पड़नेवाली कोई अखबार नहीं हूँ मै...
हर सुबह-सुबह जन्मकर शाम को  फेंकी जानेवाली रद्दी भी नही हु मैं...!!
किसी भी दीवार के  कोने में लटका हुवा कैलेंडर भी नहीं हूँ मैं...!!
नाही समारोह की पूजा की थाली एवं जुड़े में खोंसी गयी माला  या कोई सुगंधित फूल  वो भी नहीं हूँ मैं...!!
गौर से सुना ही दु  अब  मैं भी इस जग को के खिड़की की किसी  कांच में सटकर लगी   धूल भी नही  हूँ मैं...!!
शोभा नही,साज नही, आभा नही,अंदाज नही वाद नही,राग भी नही... एक बुलन्द आवाज हु मैं..!! अंत भी  तथा आगाज भी हु मैं..!! एक जिंदादिल इंसान हु मैं...!! सुनो....कोई वस्तु नही हु मैं...!!
इसलिए अब पोंछकर साफ  करना ही होगा तुम्हे प्रथा,परम्परा,व्यवस्था का आईना...!!
हवस,वासना व दम्भ से युक्त इस समाज  के हवेली की खिड़की की कांच में लगा अंधविश्वास,  अनैतिकता व आडम्बर का दाग...!!
विश्व की शांति ,सुकून व नारी के सम्मान के लिए...!!
- वृषाली सानप काले

क्या है आध्यात्म..? (भाग-14) [परमपिता परमात्मा भाग 1]

परमपिता परमात्मा भाग १ ********************* जिस तरह एक जानवर का पिता जानवर होता है। इंसान नहींं होता उसी तरह एक आत्मा का पिता जो होता है वो भी आत्मा ही होता है। अर्थात मनुष्य देह में स्थित सभी आत्माओं का भी एक पिता होगा। जो सभी आत्माओं से श्रेष्ठ व महान भी होगा। आत्मा जैसे निराकार है वैसे ही आत्मा का बाप अर्थात पिता भी निराकार ही होगा वो निराकार बाप  ही  "परमपिता परमात्मा" है...!! 
वो निराकार परमात्मा जो सभी आत्माओं का बाप है वो जाहिर है बच्चो से थोड़ा तो अलग होगा। वो परमात्मा देह में कभी भी नही बंधता, इसीलिए वह न कभी जन्म लेता न कभी मरता है। वह अजेय, अमर, अनंत, अविनाशी, निराकार व अलौकिक शक्तिरूप है...!! जो इस सृष्टि का निर्माता, रचैता, रक्षक, एवं वही इसका विनाश भी करता है, निश्चित समय के पश्चात...!! शांति, सुख, आनंद, प्रेम, शक्ति, पवित्रता, ज्ञान, सत्यता का सागर है परमपिता परमात्मा...!!
परमपिता परमात्मा जिसने इस सृष्टि की रचना की क्योँकि वही इसका रचयिता है। जो रचैता होता है वह रचना के भीतर नहींं आता बल्कि रचना के बाहर रहकर रचना का अवलोकन करता है...!! तो परमात्मा की रचना आत्…

અષાઢી મેઘ

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અષાઢી મેઘ - Kaushalya


ભીની માટી ની સોડમ આવે, મને બચપન ની યાદ સાંભરી,
આજ આ ખુશનુમા મૌસમ માં મન મૂકી ઝૂમવા ચાહે,
મન પ્રફુલ્લિત છે આજ, ભીંજાય જાવ આજ મન મૂકી
ઝરમર મેહ વરસે આજ, માટી ની મહેક પ્રસરી રહી
અષાઢની રઢિયાળી રાત માં, મન પણ તેના રંગ માં રંગાવા ચાહે.... ****